यह ब्लॉग खोजें

सोमवार, 30 मार्च 2026

फैशनेबल वकील

                                                                        


फैशनेबल वकील 


नादेझ्दा तेफ़ी

 

अनुवाद

आ. चारुमति रामदास

 

उस दिन अदालत में लोग कम थे. किसी दिलचस्प मीटिंग की उम्मीद नहीं थी. फेन्सिंग के पीछे  - थके हुए और गहरी साँसें लेते हुए तीन नौजवान रूसी कमीज़ पहने बेंचों पर बैठे थे. पब्लिक वाली जगह पर  - कुछ विद्यार्थी और महिलाएँ हैं, कोने में – दो रिपोर्टर्स. अगला केस सिम्योन रुबाश्किन का था. जैसा कि आरोप पत्र में कहा गया था, उस पर इलजाम था अखबार के एक लेख में “प्रथम ड्यूमा भंग करने के बारे में गलत-सलत अफवाहें फैलाने का.”  आरोपी हॉल में मौजूद था और अपनी पत्नी तथा तीन मित्रों के साथ लोगों के सामने घूम रहा था. सभी प्रसन्न थे, परिस्थिति की असाधारणता से उत्तेजित थे, बतिया रहे थे और मज़ाक कर रहे थे. “कम से कम जल्दी ही शुरू कर देते,” रुबाश्किन कह रहा था, “भूखा हूँ, कुत्ते जैसा.”

‘और यहाँ से हम सीधे ‘विएना जायेंगे नाश्ता करने के लिए,’ -  बीबी कल्पना कर रही थी.

“हा! हा! हा! जब उसे जेल में बंद कर देंगे, तभी होगा आपका नाश्ता,” स्नेही तंज़ कस रहे थे.

“बेहतर होगा ‘साइबेरिया जाना,” – बीबी इठलाते हुए बोली, “हमेशा रहने के लिए. मैं तब किसी और से शादी कर लूंगी.”

स्नेही दोस्ताना अंदाज़ में ठहाके लगा रहे थे और रुबाश्किन का कंधा थपथपा रहे थे. 

हॉल में टेलकोट पहने एक मोटे व्यक्ति ने प्रवेश किया और, धृष्ठता से आरोपी की दिशा में सिर हिलाकर स्टैण्ड के पीछे बैठकर अपनी ब्रीफकेस से कागज़ात छाँटने लगा।

“ये और कौन है?” बीबी ने पूछा।

“हां, ये मेरा एडवोकेट है।“

“एडवोकेट?” दोस्तों को आश्चर्य हुआ। “तुम्हारा दिमाग चल गया है! ऐसे मामूली काम के लिए एड़वोकेट रख लिया!

“हां, भाई, चूजों के हंसने के लिए है. ये करेगा क्या? उसके पास तो कहने के लिए कुछ भी नहीं है! कोर्ट सीधे बर्खास्त कर देगा.”    

“हां मैं, सच कहूँ, तो मैं उसे आमंत्रित करने वाला नहीं था. उसने खुद ही अपनी सेवाएँ पेश कीं. और पैसे भी नहीं लेगा. कहता है, कि हम ऐसे मामलों को सैद्धांतिक तौर पर लेते हैं. मानधन से सिर्फ अपमानित महसूस करते हैं. मैंने, बेशक, ज़िद नहीं की. उसका अपमान क्यों करूँ ?”

“अपमान करना बुरी बात है,” बीबी ने सहमति दर्शाई.

“और फिर, वह मेरा क्या बिगाड़ रहा है? बस, पांच मिनट बकबक करेगा. और, हो सकता है, उससे कोई फ़ायदा ही हो जाए. कौन जानता है? कोई जुर्माना ही लगाने की सोचें, और वो मामला रफ़ा-दफ़ा कर देगा.”

“ऊं-हाँ, ये सही है,” दोस्तों ने सहमति जताई. एडवोकेट उठा, अपने कल्ले सीधे किये, भौंहे चढ़ाईं और रुबाश्किन के पास आया.

“मैंने आपका ‘केस देख लिया है,” उसने उदासी से कहा, और आगे बोला, “हिम्मत रखो.”

फिर अपनी जगह पर वापस आया.

“अजीब है!” दोस्त चहके.

“भाड़ में जाए,” रुबाश्किन ने फ़िक्र से सिर हिलाया. “जुर्माने की बू आ रही है.”

 

****

 

“कृपया खड़े हो जाएं! जज साहब आ रहे हैं!” अदालत का कारिन्दा चिल्लाया.

आरोपी अपने कठघरे के पीछे बैठ गया और वहां से बीबी और दोस्तों को देखते हुए सिर हिलाया, गर्व और संभ्रम से सिर हिलाते हुए, जैसे कोई घटिया कॉम्प्लिमेंट मिला हो.

“हीरो है!” एक दोस्त ने फ़ुसफुसाकर बीबी से कहा.

“ऑर्थोडॉक्स!” प्रमुख के सवाल के जवाब में आरोपी कह रहा था.

“क्या आप स्वयँ को इस लेख का लेखक स्वीकार करते हैं, जिसे एस.आर. से हस्ताक्षरित किया गया है?

“स्वीकार करता हूँ.”

“इस ‘केस के बारे में और क्या कहना चाहते हैं?

“कुछ नहीं,” रुबाश्किन को आश्चर्य हुआ.

मगर तभी एडवोकेट उछला. उसका चेहरा लाल हो गया था, आंखें बाहर निकलने को हो रही थीं, गर्दन सूज गई. ऐसा लग रहा था, मानो उसने मटन की हड्डी को दबा दिया है.

“अदालत के सज्जनों!” वह चहका. हाँ, ये आपके सामने है, ये सिम्योन रुबाश्किन. इसने प्रथम ड्यूमा के भंग होने के बारे में लेख लिखा है, और उसका प्रचार भी किया है, ये लेख केवल दो अक्षरों से हस्ताक्षरित है – मगर ये अक्षर एस.आर. हैं. आप पूछेंगे कि केवल दो ही अक्षरों से कयों. तीन से क्यों नहीं, मैं भी पूछूंगा.

इस सौम्य और समर्पित बेटे ने अपने बाप का नाम क्यों शामिल नहीं किया? कहीं ऐसा तो नहीं, कि केवल दो ही अक्षरों एस. और आर. की ज़रुरत थी? कहीं यह भयानक और शक्तिशाली पार्टी का प्रतिनिधि तो नहीं है? जज महोदय! कहीं आप ये तो नहीं सोच रहे हैं, की मेरा क्लाएंट सिर्फ एक अखबार का लेखक है, जिसने एक असफल लेख में गलत वाक्य का इस्तेमाल किया था. नहीं, जज महोदय! आपको उसे अपमानित करने का कोई अधिकार नहीं है, जो, हो सकता है, किसी गुप्त शक्ति को प्रदर्शित करता हो, मतलब, उसके मूल को, मैं कहता, हमारे क्रांतिकारी आन्दोलन के भावनात्मक पक्ष को. उसका अपराध नगण्य है – आप कहेंगे. नहीं! – मैं चाहकूंगा. मैं विरोध करूंगा करता हूँ.”

प्रेसिडेंट ने बेलिफ को बुलाया और उससे विनती की कि आम जनता को हॉल से बाहर जाने के लिये कहे.

एडवोकेट ने पानी पिया और आगे बोला:

“आपको सफ़ेद हैट वाले नायकों की ज़रुरत है! आप नम्र कार्यकर्ताओं को कोई महत्त्व नहीं देते, जो “हाथ ऊपर” चिल्लाते हुए सामने नहीं आते, मगर जो गुप्त रूप से, बिना किसी नाम के सशक्त आन्दोलन का नेतृत्व करते हैं. और, क्या मॉस्को बैंक डकैती के लीडर के सिर पर सफेद टॉप था? और क्या उसके सिर पर सफेद टॉप था, जो वॉन-देर की हत्या वाले दिन खुशी से सिसक रहा था...वैसे, मुझे अपने मुवक्किल द्वारा एक सीमा के भीतर ही अधिकार दिया गया है. मगर इन सीमाओं के भीतर भी मैं बहुत कुछ कर सकता हूँ.”

अध्यक्ष ने दरवाज़े बंद करने और गवाहों को हटाने का आदेश दिया.

“क्या आप यह सोच रहे हैं कि साल भर की जेल आपके लिए इस सिंह को खरगोश बना देगी?

वह मुड़ा और कुछ पल रुबाश्किन के पसीने से लथपथ, परेशान चेहरे की ओर इशारा करता रहा. इसके बाद, उसने ऐसा दिखाया कि मुश्किल से इस शानदार दृश्य से दूर हो रहा है, और आगे बोला:

“नहीं! कभी नहीं! जेल में वह सिंह की तरह बैठेगा और सौ सिरों वाले हायड्रा के रूप में बाहर आयेगा! वह लिपट जाएगा, अजगर की तरह, अपने भयभीत दुश्मन से, और प्रशासनिक मनमानी की हड्डियां उसके ताकतवर दांतों से चूर चूर हो जायेंगी. क्या आपने उसके लिए साइबेरिया निश्चित किया है? मगर, जज, महोदय! मैं आपसे कुछ नहीं कहूंगा. मैं आपसे सिर्फ इतना पूछूंगा कि गेर्शूनी कहाँ है? गेर्शूनी, जिसे आपने साइबेरिया भेजा था? और किसलिए? क्या जेल, निर्वासन, कठोर श्रम, यातनाएं (जो, सच कहूं तो, मेरे मुवक्किल पर किसी कारण से नहीं दी गईं), क्या ये सारी भयानक यातनाएं उसके कटु होठों से स्वीकारोक्ति का कम से कम एक भी शब्द या उसके हज़ारों साथियों में से एक का भी नाम उगलवा सकती थीं? नहीं, सिम्योन रुबाश्किन ऐसा नहीं है! वह गर्व से सूली पर चढ़ जाएगा, गर्व से अपने जल्लाद को हटा देगा, और धर्मगुरू से कहकर: “मुझे सांत्वना की ज़रुरत नहीं है!!” – खुद ही अपनी गर्वीली गर्दन में फंदा डाल लेगा. न्यायाधीश महोदय! मैं इस महान छवि को “भूतपूर्व” पत्रिका के पन्नों पर, इस महान योद्धा के अंतिम क्षणों के बारे में लिखे मेरे लेख की बगल में देख रहा हूँ, जिसे सैंकड़ों होठों की प्रार्थनाएं रूसी क्रान्ति का अमर नायक बना देंगी. मैं भी उसके अंतिम शब्दों को दुहराऊंगा, जो वह सिर पर बैग चढाने के बाद बोलेगा: “घृणा का नाश हो...”

अध्यक्ष ने सफाई वकील को बोलने से रोक दिया. सफ़ाई वकील ने माफ़ी मांग ली, सिर्फ अपनी दरख्वास्त स्वीकार करने की विनती की, कि उसका क्लाएंट,सिम्योन रुबाश्किन, क्षमा माँगने की दरख्वास्त पर हस्ताक्षर करने से इनकार करता है. 

***

जज मीटिंग के लिए नहीं निकले और उन्होंने फ़ौरन अपराध की धारा बदल दी और नागरिक सिम्योन रुबाश्किन को संपत्ति के सभी अधिकारों से वंचित कर दिया, और फांसी पर लटकाने का हुक्म दिया. अपराधी को संज्ञाहीन अवस्था में मीटिंग हॉल से बाहर ले जाया गया.

 

*****

अदालत के कैफ़े में नौजवानों ने जोर शोर से एडवोकेट का स्वागत किया. वह प्रसन्नता से मुस्कुराया, झुका, सबसे हाथ मिलाए. इसके बाद सॉसेज खाकर और बीयर का एक गिलास पीकर, अदालत के अभिलेखक को अपनी स्पीच का ड्राफ्ट बनाने के लिए कहा. – “मुझे टाइपिंग की गलतियाँ पसंद नहीं हैं,”  उसने कहा.

 

****

कॉरीडोर में एक विकृत चेहरे और पीले होंठों वाले सज्जन ने उसे रोका. ये रुबाश्किन के दोस्तों में से एक था.

“क्या वाकई में सब ख़त्म हो गया है? कोई उम्मीद नहीं है?

एडवोकेट उदासी से मुस्कुराया.

“कुछ नहीं कर सकते! रूसी वास्तविकता का दु:स्वप्न ! ....”

 

************************

शुक्रवार, 27 मार्च 2026

माँ क्या कहती?

  

माँ क्या कहती?

ल्यूबोव वरान्कोवा  

 

अनुवाद

आ. चारुमति रामदास

 

 

ग्रीन्का और फेद्या सोरेल (खट्टी घास) चुनने के लिए घास के मैदान में जाने के लिए तैयार हो रहे थे. वान्या भी उनके साथ हो लिया.

“जा, जा,” दादी ने कहा, “सोरेल लाएगा, हरी गोभी का सूप बनायेंगे.”

मज़ा आ रहा था घास के मैदान में. घास अभी नहीं काटी गयी थी. चारों तरफ – दूर दूर तक फूल चमक रहे थे – लाल भी, नीले भी, सफ़ेद भी. पूरा मैदान फूलों से भरा था.    

लडके घास के मैदान में बिखर गए और सोरेल तोड़ने लगे. ऊंची ऊंची घास में, प्यारे-प्यारे फूलों में, वे आगे-आगे बढ़ते गए.

अचानक फेद्या ने कहा:

“यहाँ बहुत सारी मधुमक्खियाँ हैं!”

“सच्ची, यहाँ बहुत मधुमक्खियाँ हैं,” वान्या ने भी कहा. “पूरे समय भिनभिना रही हैं.”

“ऐ, लड़कों,” ग्रीन्का दूर से चिल्लाया, “पीछे मुड़ो ! हम मधुमक्खियों के बगीचे में पहुँच गए हैं – ये रहे मधुमक्खियों के छत्ते!”

सामूहिक फ़ार्म के छत्तों को लिंडन और अकासिया के घने पेड़ों ने चारों तरफ़ से घेरा हुआ था. और टहनियों के बीच से मधुमक्खियों के छोटे छोटे घर दिखाई दे रहे थे.

“लड़कों, पीछे हटो!” ग्रीन्का ने हुक्म दिया. “मगर धीरे से, हाथ न हिलाना, वर्ना मधुमक्खियाँ काटेंगी.”

लड़के सावधानी से छत्ते से दूर हटे. वे खामोशी से चल रहे थे और हाथ नहीं हिला रहे थे, ताकि मधुमक्खियों को गुस्सा न दिलाएं. और वे करीब-करीब मधुमक्खियों से दूर हट गए थे, मगर तभी वान्या ने सुना कि कोई रो रहा है. उसने अपने साथियों की ओर देखा, मगर न तो फेद्या रो रहा था, ना ही ग्रीन्का, बल्कि मधुमक्खी पालक का बेटा, छोटा वासित्का रो रहा था. वह मधुमक्खियों के बगीचे में चला गया था और छत्तों के बीच खडा था, और मधुमक्खियाँ उस पर झपट पड़ी थीं.

“दोस्तों!” वान्या चीखा. “वास्याता को मधुमक्खियों ने काटा!”

“तो, क्या हमें उसके पीछे मधुमक्खियों के छत्ते में जाना चाहिए?” ग्रीन्का ने पूछा, “मधुमक्खियाँ हमें भी काटेंगी.”

“उसके पापा को बुलाना चाहिए,” फेद्या ने कहा. “उनके घर के सामने से चलते हैं, उसके पापा को बता देंगे.”

और दोनों आगे चले. मगर वान्या वापस लौटा और सीधे छत्ते की ओर चला.

“यहाँ आ!” उसने चिल्लाकर वास्यात्का से कहा.

मगर वास्यात्का ने सुना नहीं. वह हाथों से मधुमक्खियों को दूर भगा रहा था, और गला फाड़कर चीख रहा था.

वान्या वास्यात्का के पास गया, उसका हाथ पकड़ा और उसे छत्ते से दूर ले आया.

वास्यात्का की माँ भाग कर पोर्च में आई, उसने वास्यात्का का हाथ पकड़ा:

“आह, तू ज़िद्दी बच्चा, छत्ते के पास क्यों गया? देख, कैसे मधुमक्खियों ने काटा है!” उसने वान्या की ओर देखा. “आह, प्यारे, वानेक,” उसने कहा, “तुझे भी वास्यात्का की वजह से मक्खियों से तोहफा मिला है! खैर, कोई  बात नहीं, तुम घबराना नहीं: थोड़ा सा दर्द होगा – ख़त्म हो जाएगा!

“मुझे कुछ नहीं हुआ है,” वान्या ने कहा.

और घर चला गया. घर पहुंचते-पहुंचते उसका होंठ सूज गया, और पलक सूज गयी, और आंख बंद हो गयी.

“वाह, क्या बात है!” दादी ने कहा, “ये किसने तुझे सजाया है?

“मधुमक्खियों ने,” वान्या ने जवाब दिया.

“तो ग्रीन्का और फेद्या को मधुमक्खियों ने क्यों नहीं छुआ?

“वे भाग गए, और मैं वास्यात्का को साथ में लाया,” वान्या ने कहा. “और ऐसी भी क्या बात है? थोड़ा सा दर्द होगा – रुक जाएगा.”

पिता खेत से खाना खाने के लिए आये, वान्या की तरफ देखा और हंसने लगे.

“फेद्या और ग्रीन्का मधुमक्खियों से दूर भाग गए,” दादी ने कहा. “और हमारा भोलूराम वास्यात्का को बचाने के लिए भागा. अगर अभी माँ इसे देखती – तो वह क्या कहती?

वान्या ने एक आंख से पिता की ओर देखा और इंतज़ार करने लगा: ‘माँ क्या कहती?

मगर पिता मुस्कुराए, उन्होंने वान्या का कंधा थपथपाया :

“वो कहती : बहादुर है मेरा बेटा!” वह ऐसा ही कहती!

मंगलवार, 24 मार्च 2026

परीक्षा

  

परीक्षा


नादेझ्दा तेफ़ी

 

अनुवाद

आ. चारुमति रामदास


भूगोल की परीक्षा की तैयारी के लिए तीन दिन दिए गए थे. जिनमें से दो मानिच्का ने अपनी टेब्लेट के साथ नए बेल्ट की नाप लेने में व्यर्थ गँवा दिए. तीसरे दिन शाम को पढ़ने के लिए बैठी. किताब खोली, नक्शा खोला और – फ़ौरन समझ गई कि वह बिल्कुल कुछ भी नहीं जानती है. न तो नदियाँ, न पहाड़, न ही शहर, न समुद्र, न खाड़ी – बिल्कुल कुछ भी नहीं. और वे बहुत सारे थे – हर चीज़ किसी न किसी बात के लिए मशहूर थी. हिन्द महासागर टाइफ़ून्स के लिए, व्याज़्मा – जिंजर ब्रेड के लिए, पम्पासी – जंगलों के लिए, ल्यानोसी – स्तेपियों के लिए, वेनिस – नहरों के लिए, चीन – पूर्वजों के प्रति आदर के लिए. सब कुछ मशहूर था! अच्छी प्रसिद्धि घर के भीतर ही रहती है, और बदनामी दुनिया भर में भागती फ़िरती है – और पिन्स्क की दलदल भी बुखार के लिए मशहूर है. ये नाम तो मानिच्का रट भी लेती, मगर प्रसिद्धि के बारे में याद नहीं रख पायेगी. “खुदा, अपनी गुलाम मारिया को भूगोल का इम्तिहान पास करने में मदद कर! और उसने नक़्शे के मार्जिन पर लिखा: ‘खुदा, मदद कर! खुदा मदद कर! खुदा मदद कर!’ तीन बार. फिर उसने सोचा : बारह बार लिखती हूँ, “खुदा मदद कर”, तब इम्तिहान पास कर लूंगी. बारह बार लिखा, मगर आख़िरी लब्ज़ लिखते हुए, उसने खुद ही सोचा: “अहा! खुश हूँ कि पूरा लिख लिया. नहीं, मान! अगर इम्तिहान पास करना है, तो और बारह बार लिख, बल्कि बेहतर होगा पूरे बीस बार. उसने नोट बुक ली, क्योंकि नक़्शे की मार्जिन पर जगह बहुत कम थी, और लिखने बैठ गयी. लिखती और बोलती जाती: “सोच, क्या बीस बार लिखने से इम्तिहान पास कर लोगी? नहीं, प्यारी, पचास बार लिखो! हो सकता है, तभी कुछ बात बने. पचास बार? खुश हो गई कि जल्दी ही पूरा हो जाएगा! आँ? सौ बार, ज़रा भी कम नहीं...कलम थरथरा रही है, और धब्बे गिरा रही है. मानिच्का ने चाय और डिनर से इनकार कर दिया. उसके पास फ़ुर्सत ही नहीं है. जल्दी जल्दी और तनाव में काम करने से उसके गाल जल रहे हैं, वह पूरी थरथरा रही है. रात के तीन बजे दो नोट बुक्स और एक पैड पूरा लिख देने के बाद मेज़ पर ही उसकी आंख लग गई.

 

*****

 

सुन्न और उनींदी, उसने कक्षा में प्रवेश किया. सब लोग आ चुके थे और अपनी उत्तेजना एक दूसरे के साथ बांट रहे थे. – ‘मेरा दिल हर मिनट आधे घंटे के लिए रुक जाता है!” पहली छात्रा ने आंखें गोल-गोल घुमाते हुए कहा.

मेज़ पर परिक्षा के टिकट रखे थे. अत्यंत अनुभवहीन आंख भी उन्हें फ़ौरन चार श्रेणियों में बांट सकती थी : टिकट जो गोल गोल पाईप की भांति मुड़े हुए थे, नाव जैसे, ऊपर उठे हुए कोनों वाले, और नीचे झुके कोनों वाले. मगर संदेहास्पद व्यक्तियों, पिछली बेंचों वालों को, जिन्होंने ये चालाक तरीका बनाया था, यह प्रतीत हुआ, की अभी भी ये सब पर्याप्त नहीँ है, और वे मेज़ के इर्द गिर्द घूम रहे थे, टिकट्स को ठीक करते हुए, जिससे ज़्यादा स्पष्ट दिखाई दे,

-    “मान्या कूक्सिना!” वे चिल्लाए. “तूने कौन से टिकट मुँहजुबानी याद किये हैं? आं? देख, ये सब कैसे होता है! नाव जैसे – पहले पांच टिकट्स हैं, और पाईप जैसे – अगले पांच, और कोनों वाले...” मगर मानिच्का ने पूरी बात नहीं सुनी.  उसने उदासी से सोचा, कि ये सब पढ़ने-लिखने की बातें उसके लिए नहीं बनीं हैं, जिसने एक भी टिकट मुंह जुबानी याद नहीं किया है,” – और उसने गर्व से कहा: “इस तरह दादागिरी करना शर्म की बात है! पढ़ाई अपने लिए करना होती है, न कि नंबर लाने के लिए.”

टीचर आये, बैठ गए, उदासीनता से सारे टिकट्स इकट्ठा किये और, उन्हें करीने से रखकर आपस में मिला दिया. क्लास में हल्की सी कराह गूंजी. परेशान हो गए और ऐसे झूलने लगे, जैसे हवा में रई का पौधा डोलता है. “मैडम कुक्सिना! प्लीज़ यहाँ आईये. मानिच्का ने टिकट उठाया और पढ़ा: “जर्मनी की जलवायु. अमेरिका की प्रकृति. उत्तरी अमेरिका के शहर”...   

“हाँ, मैडम कुक्सिना. आप जर्मनी की जलवायु के बारे में क्या जानती हैं?

मानिच्का ने उसकी तरफ़ ऐसी नज़र से देखा, जैसे कहना चाहती हो, “जानवरों को क्यों सता रहे हो?” – और गहरी सांस लेकर बुदबुदाई: “जर्मनी की जलवायु इस बात के लिए प्रसिद्ध है, कि वहां उत्तर और दक्षिण की जलवायु में ख़ास फ़रक नहीं है, क्योंकि जर्मनी जितना उत्तर की ओर है, उतना ही दक्षिण की तरफ़ भी है...”

टीचर ने भौंह चढ़ाई और मानिच्का के मुंह की तरफ़ देखा. – “तो-,” उसने कुछ देर सोचा और कहा, “आप जर्मनी की जलवायु के बारे में कुछ भी नहीं जानती, मैडम कुक्सिना. बताइये, आप अमेरिका की प्रकृति के बारे में क्या जानती हैं?

मानिच्का ने, अपने ज्ञान के प्रति शिक्षक के अन्यायपूर्ण रवैये से उदास होकर सिर झुकाया और संक्षेप में जवाब दिया: “अमेरिका पम्पास के लिए प्रसिद्ध है.”

शिक्षक खामोश रहा, और मानेच्का ने एक मिनट इंतज़ार करने के बाद आगे कुछ ऊंची आवाज़ में जोड़ा: “और पम्पास, - लानोस के लिए.”

शिक्षक ने ज़ोर से गहरी सांस ली, जैसे जाग गया हो, और भावपूर्ण आवाज़ में बोला:

“बैठ जाईये, मैडम कुक्सिना.”

*****

अगली परीक्षा इतिहास की थी. शांत महिला ने कठोरता से चेतावनी दी: “देखों कुक्सिना! दो-दो पुनः परीक्षाएं तो तुम्हें देने से रहे, इतिहास की तैयारी ठीक तरह से करो, वरना दूसरा साल भी यहीं रुक जाओगी. कैसी शर्म की बात है! अगले पूरे दिन मानेच्का दबाव में रही. दिल बहलाने के लिए आईस्क्रीम वाले से पिस्ते के दस डिब्बे खरीद लिये, और शाम को अपनी इच्छा के विरुद्ध कैस्टर ऑइल पी लिया. मगर अगले दिन, - परिक्षा शुरू होने से एक दिन पूर्व, मार्लिट की दूसरी पत्नी पढ़ते हुए दीवान पर लेटी रही, ताकि दिमाग़ को कुछ आराम दे सके, जो ‘भूगोल’ के कारण बेहद थक गया था. शाम को इलावायस्की को लेकर बैठी डरते-डरते लगातार दस बार लिख डाला: “खुदा, मेहेरबानी...” कड़वाहट से मुस्कुराई और बोली: “दस बार! जैसे खुदा को दस ही बार कहने की ज़रुरत है! डेढ़ सौ बार लिखती तो बात कुछ और होती! सुबह छह बजे बगल वाले कमरे से आंटी ने सुना, कि मानिच्का कैसे अपने आप से दो आवाजों में बात कर रही है. एक आवाज़ कराह रही थी: “अब और ज़्यादा नहीं कर सकती! ओह, नहीं कर सकती! दूसरी आवाज़ ने व्यंग्य से कहा: “आहा! नहीं कर सकती! एक हज़ार छः सौ बार नहीं लिख सकती, ‘खुदा, मेहेरबानी ...’, मगर परिक्षा तो पास करना चाहती हो! तो, लो! इसकी सज़ा ये है, कि दो सौ हज़ार बार लिखो! कोई बात नहीं! कोई बात नहीं! भयभीत आंटी ने मानिच्का को सोने के लिए भेजा. ‘ऐसा नहीं करते. रटाई भी एक हद के भीतर होनी चाहिए. थकान से चूर हो जाओगी, तो कोई भी जवाब न दे पाओगी.

क्लास में वही पुराना दृश्य था, भयभीत फुसफुसाहट और परेशानी, और पहली विद्यार्थिनी का दिल, जो हर मिनट तीन घंटों के लिए रुक जाता था, और परिक्षा के टिकट, जो चार पैरों पर घूम रहे थे, और उदासीनता से उन्हें फेंटता हुआ टीचर. 

मानिच्का बैठी है और, अपनी किस्मत के फैसले का इंतज़ार करते हुए पुरानी नोटबुक के कवर पर लिखती है: 

‘खुदा मेहेरबानी कर. सिर्फ छः सौ बार लिख ले तो वह बढ़िया अंकों से पास हो जायेगी!’

“मैडम, कुक्सिना मारिया!”

नहीं, नहीं लिख पाई! टीचर गुस्से में है, व्यंग्य करता है,  सभी से  प्रश्न-टिकट के अनुसार नहीं, बल्कि कहीं से भी, कुछ भी पूछ लेता है.

“आन्ना इयोनव्ना के युद्धों के बारे में और उनके परिणामों के बारे में आप क्या जानती हैं, मैडम कुक्सिना?”

मानिच्का के थके हुए दिमाग़ में कोई चीज़ रेंग गयी: “आन्ना इयोनव्ना का जीवन भरा हुआ था...आन्ना इयोनव्ना भरी हुई थी...आन्ना इयोनव्ना के युद्ध भरे हुए थे....वह थोड़ा रुकी, गहरी सांस ली, और आगे बोली, मानो आखिरकार सही चीज़ कह रही हो: “आन्ना इयोनव्ना के परिणाम भरे हुए थे...और खामोश हो गई .

टीचर ने हथेली में अपनी दाढी लेकर नाक पर दबाई. मानिच्का पूरे मन से इस हरकत को देख रही थी, और उसकी आंखें कह रही थीं : ‘जानवरों को क्यों तंग करते हो?

“क्या आप अब बतायेंगी, मैडम कुक्सिना,” टीचर ने हौले से पूछा, “ओरलियन्स की कन्या को ‘ओर्लियान्साकाया’ क्यों कहते थे?

मानिच्का ने महसूस किया कि ये अंतिम प्रश्न है, जिसके परिणाम भयानक, सबसे ‘भयानक परिणाम’ होंगे. सही जवाब के साथ होंगे : साइकिल, जिसका वादा आंटी ने अगली कक्षा में जाने पर किया था, और लीजा बेकिना के साथ चिरंतन दोस्ती, जिससे, फ़ेल होने पर जुदा होना पडेगा. लीज़ा ने तो परिक्षा पास कर ली थी, और आराम से अगली कक्षा में चली जायेगी.

“तो?” शिक्षक जल्दी कर रहे थे, ज़ाहिर है, वह मानिच्का का जवाब सुनने के लिए उतावले हो रहे थे.

“उसे ओर्लियान्स्काया क्यों कहते थे?

मानिच्का ने मन ही मन वादा किया की फिर कभी मीठा नहीं खायेगी और असभ्यता से बर्ताव नहीं करेगी.  

उसने ‘आइकन’ की तरफ़ देखा, गला साफ़ किया, और शिक्षक की आंखों में सीधे देखते हुए दृढ़ता से जवाब दिया : “क्योंकि वह ‘लड़की’ थी.”   

 

**********