माँ क्या कहती?
ल्यूबोव
वरान्कोवा
अनुवाद
आ. चारुमति
रामदास
ग्रीन्का और फेद्या सोरेल (खट्टी घास) चुनने के
लिए घास के मैदान में जाने के लिए तैयार हो रहे थे. वान्या भी उनके साथ हो लिया.
“जा, जा,” दादी ने कहा, “सोरेल लाएगा, हरी गोभी का सूप बनायेंगे.”
मज़ा आ रहा था घास के मैदान में. घास अभी नहीं
काटी गयी थी. चारों तरफ – दूर दूर तक फूल चमक रहे थे – लाल भी, नीले भी, सफ़ेद भी. पूरा मैदान
फूलों से भरा था.
लडके घास के मैदान में बिखर गए और सोरेल तोड़ने
लगे. ऊंची ऊंची घास में, प्यारे-प्यारे फूलों में, वे आगे-आगे बढ़ते गए.
अचानक फेद्या ने कहा:
“यहाँ बहुत सारी मधुमक्खियाँ हैं!”
“सच्ची, यहाँ बहुत मधुमक्खियाँ हैं,” वान्या ने भी
कहा. “पूरे समय भिनभिना रही हैं.”
“ऐ, लड़कों,” ग्रीन्का दूर से चिल्लाया, “पीछे मुड़ो ! हम
मधुमक्खियों के बगीचे में पहुँच गए हैं – ये रहे मधुमक्खियों के छत्ते!”
सामूहिक फ़ार्म के छत्तों को लिंडन और अकासिया के
घने पेड़ों ने चारों तरफ़ से घेरा हुआ था. और टहनियों के बीच से मधुमक्खियों के छोटे
छोटे घर दिखाई दे रहे थे.
“लड़कों, पीछे हटो!” ग्रीन्का ने हुक्म दिया. “मगर धीरे से, हाथ न हिलाना, वर्ना मधुमक्खियाँ
काटेंगी.”
लड़के सावधानी से छत्ते से दूर हटे. वे खामोशी से
चल रहे थे और हाथ नहीं हिला रहे थे, ताकि
मधुमक्खियों को गुस्सा न दिलाएं. और वे करीब-करीब मधुमक्खियों से दूर हट गए थे, मगर तभी वान्या ने सुना कि कोई रो रहा है. उसने अपने साथियों की ओर देखा,
मगर न तो फेद्या रो रहा था, ना ही ग्रीन्का,
बल्कि मधुमक्खी पालक का बेटा, छोटा वासित्का
रो रहा था. वह मधुमक्खियों के बगीचे में चला गया था और छत्तों के बीच खडा था, और मधुमक्खियाँ उस पर झपट पड़ी थीं.
“दोस्तों!” वान्या चीखा. “वास्याता को
मधुमक्खियों ने काटा!”
“तो, क्या हमें उसके पीछे मधुमक्खियों के छत्ते
में जाना चाहिए?” ग्रीन्का ने पूछा, “मधुमक्खियाँ हमें भी काटेंगी.”
“उसके पापा को बुलाना चाहिए,” फेद्या ने कहा. “उनके घर के सामने से चलते हैं, उसके पापा को बता देंगे.”
और दोनों आगे चले. मगर वान्या वापस लौटा और सीधे
छत्ते की ओर चला.
“यहाँ आ!” उसने चिल्लाकर वास्यात्का से कहा.
मगर वास्यात्का ने सुना नहीं. वह हाथों से
मधुमक्खियों को दूर भगा रहा था, और गला फाड़कर
चीख रहा था.
वान्या वास्यात्का के पास गया, उसका हाथ पकड़ा और उसे छत्ते से दूर ले आया.
वास्यात्का की माँ भाग कर पोर्च में आई, उसने वास्यात्का का हाथ पकड़ा:
“आह, तू ज़िद्दी बच्चा, छत्ते के पास
क्यों गया? देख, कैसे मधुमक्खियों ने काटा है!” उसने वान्या की ओर देखा. “आह, प्यारे, वानेक,” उसने कहा, “तुझे भी वास्यात्का की
वजह से मक्खियों से तोहफा मिला है! खैर, कोई बात नहीं, तुम घबराना नहीं: थोड़ा सा दर्द होगा – ख़त्म हो
जाएगा!
“मुझे कुछ नहीं हुआ है,” वान्या ने कहा.
और घर चला गया. घर पहुंचते-पहुंचते उसका होंठ
सूज गया, और पलक सूज गयी, और आंख बंद हो गयी.
“वाह, क्या बात है!”
दादी ने कहा, “ये किसने तुझे सजाया है?”
“मधुमक्खियों ने,” वान्या ने जवाब दिया.
“तो ग्रीन्का और फेद्या को मधुमक्खियों ने क्यों
नहीं छुआ?”
“वे भाग गए, और मैं वास्यात्का को साथ में लाया,” वान्या ने कहा. “और ऐसी भी क्या बात
है? थोड़ा सा दर्द होगा – रुक जाएगा.”
पिता खेत से खाना खाने के लिए आये, वान्या की तरफ देखा और हंसने लगे.
“फेद्या और ग्रीन्का मधुमक्खियों से दूर भाग गए,” दादी ने कहा. “और हमारा भोलूराम वास्यात्का को बचाने के लिए भागा. अगर
अभी माँ इसे देखती – तो वह क्या कहती?”
वान्या ने एक आंख से पिता की ओर देखा और इंतज़ार
करने लगा: ‘माँ क्या कहती?’
मगर पिता मुस्कुराए, उन्होंने वान्या का कंधा थपथपाया :
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