अपने और पराये
नादेझ्दा तेफ़ी
अनुवाद
आ. चारुमति
रामदास
अपने सन्दर्भ में सभी व्यक्तियों को हम “अपने” और “पराए” में विभाजित
करते हैं.
अपने – ये वो होते हैं, जिनके बारे में हम, शायद, जानते हैं, कि उनकी उम्र कितनी है और उनके पास कितने पैसे
हैं. परायों की उम्र और उनकी संपत्ति हमसे
हमेशा और पूरी तरह छिपी रहती है, और यदि किसी कारण से यह भेद हम पर खुल जाता है, तो ‘पराये’ पल भर में अपने बन जाते हैं, और यह अंतिम बात हमारे लिए बेहद
अटपटी है, और इसीलिये ‘अपने' सच्चाई को हमारी आँखों में चुभोने को अपना कर्तव्य
मानते हैं, जबकि ‘पराये’ नज़ाकत से झूठ बोल देते हैं. किसी
व्यक्ति के जितने ज़्यादा ‘अपने’ होते हैं, उतनी ही ज़्यादा अपने बारे
में कड़वी सच्चाई को वह जानता है, और उतना ही उसके लिए दुनिया
में जीना मुश्किल हो जाता है.
मिसाल के तौर पर, आप रास्ते में किसी पराये आदमी से मिलते हैं. वह
प्यार से मुस्कुराएगा और कहेगा: “आज आप कितनी ताज़ा तरीन लग रही हैं!” और तीन मिनट
बाद (इतने समय में आपमें भला क्या बदल सकता है?) ‘अपना' आता है, वह आपको संदेह भरी नज़र से देखेगा और कहेगा: “डियर, ये तुम्हारी नाक कुछ सूजी हुई है. क्या ज़ुकाम है?” अगर आप बीमार हैं, तो ‘परायों'[i] से आपको सिर्फ खुशी और प्रसन्नता मिलती है: सहानुभूति के पत्र, फूल, मिठाईयां. ‘अपना’ – सबसे पहले यह बात जानना अपना
कर्तव्य समझता है, कि आपको कहाँ और कब ज़ुकाम लगा होगा, जैसे यही सबसे महत्वपूर्ण बात है. जब, आखिरकार, उसकी राय में स्थान और समय निश्वित हो जाता है, तो वह आपको डांटने लगेगा, कि आपको ज़ुकाम क्यों हो गया, वहीं, फ़ौरन – “आख़िर बिना गलोशों (रबर के ऊपरी जूते –
अनु.) के माशा आंटी के यहाँ कैसे चले गए! ये तो सीधे-सीधे गुस्सा दिलाने वाली
बात है - इतनी लापरवाही - आपकी उम्र में! इसके अलावा, पराये हमेशा ऐसा दिखाते हैं, कि आपकी बीमारी से बहुत डर
गए हैं और उसे बेहद गंभीरता से ले रहे हैं.
–
“माय गॉड, आप तो, शायद खांस रहे हैं! ये खतरनाक बात है! आपको शायद
निमोनिया है! खुदा के लिए, डॉक्टरों की परामर्श समिति को बुलाईये. इसे हलके
में मत लीजिये.”
मैं शायद परेशानी से पूरी रात न सो पाऊँ. ये सब आपके लिए अच्छा है, इसके अलावा, मरीज़ को भी हमेशा अच्छा ही लगता है, जब उसके बकवास
इन्फ़्लुएन्ज़ा को, जब तापमान 37.1 डिग्री हो, बढ़ा चढ़ाकर न्यूमोनिया कहां जाता है. ‘अपनों’ का बर्ताव एकदम अलग होता है.
“बताईये, प्लीज़! ये तो बिस्तर पर लुढ़क गया! ओह, ऐसी बेवकूफी से क्या शर्म नहीं आयेगी! अपमानजनक संदेह...खैर, अपने आप को संभालो – ऐसी कमज़ोरी अच्छी नहीं है! – अच्छा मज़ाक है, जब मेरा तापमान अड़तीस डिग्री है” – पूरी एक डिग्री बढ़ाकर आप चीखते हो.
“बहुत अच्छी बात है!” अपना वाला मज़ाक उडाता है. “लोग टाइफ़ाइड को पैरों पर साथ
लिए फिरते हैं, और ये अड़तीस डिग्री पर मरने चला है. खतरनाक! और वह बड़ी देर तक आपको
चिढ़ाता रहेगा, कई दिलचस्प किस्से सुनाते हुए, जब आप इसी तरह आंखें घुमाते थे और कराहते थे, और दो घंटे बाद भुनी हुई टर्की खा रहे थे. ये किस्से आपको गुस्से से बेकाबू
कर देते हैं, आपका बुखार उस डिग्री तक बढ़ा देते हैं, जहां तक आप उसे झूठमूठ ले
गए थे. ‘अपनों' की भाषा में इसे कहते हैं ‘रिश्तेदार मरीज़ की
हिम्मत बढ़ाना’.
“अपनों' को जानना बहुत दुखदायी और चिडचिडाहटभरा होता है.
‘पराये' हंस कर आपका स्वागत करते हैं, ऐसा दिखाते हैं कि आपके आने से उन्हें बेहद खुशी हुई है. क्योंकि उनकी उम्र
के बारे आपको नहीं जानना चाहिए, इसलिए उन सबके चेहरे पाउडर
से पुते हुए और जवान नज़र आते हैं, बातचीत प्रसन्न, गतिविधियाँ
जिंदादिल और आत्मविश्वास से भरपूर. और चूंकि आपको नहीं जानना चाहिए कि उनके पास
कितना पैसा है, तो आपको धोखे में रखने के लिए स्वादिष्ट और महंगे
पदार्थीं से आपका स्वागत करेंगे. इसी कारण से आपको सबसे बढ़िया कमरे में बिठाएँगे, जिसमें बेहद ख़ूबसूरत फर्नीचर होगा, जितना संभव होगा, और फटे हुए परदों वाले बेडरूम्स और वाशबेसिन के बदले स्टूल दिखाएँगे भी नहीं,
चाहे आप कितना ही क्यों न पूछो. आपके लिए नए कप्स रखेंगे, और केतली भी टूटी हुई टोंटी वाली नहीं, नैपकिन देंगे साफ़ सुथरा, और बातचीत ऐसी होगी, जो आपको प्यारी लगे – आपकी किसी योग्यता के बारे
में, और अगर आपमें वह नहीं है, तो आपकी नई हैट के बारे में, और अगर वह भी न हो तो, आपके अच्छे स्वभाव के बारे में. “अपनों” में आपको ऐसी कोई बात न मिलेगी ,
क्योकि आपकी पूरी उम्र के बारे में वे जानते हैं, इसलिए अलसाए हुए, और नाक चढ़ाए पेश आते हैं. “ए-एख, बुढापा खुशगवार नहीं होता.
तीसरे दिन सिर दर्द करने लगता है. और फिर याद करते हैं, कि कितने साल बीत गए हैं, स्कूल ख़त्म करके. “आह, वक्त तो कैसे उड़ जाता है! क्या पुरानी बात है, और देखो तो, तीस साल बीत गए. फिर, क्योंकि आपको मालूम है, कि उनके पास कितने पैसे हैं, और इस बारे में आपको बेवकूफ़ नहीं बनाया जा सकता, तो आपको चाय पेश की जाती है, कल के टोस्ट के साथ और
बातें होने लगती हैं ‘बीफ' की कीमत के बारे में और बूढ़े वाचमैन के बारे में, और इस बारे में, कि पुराने क्वार्टर में हवा फर्श को छूती हुई बहती
थी, और नए वाले में छत को छूकर बहती है, मगर उसका किराया दस
रूबल ज़्यादा है.
‘पराये' आपके बारे में बहुत उज्जवल भविष्यवाणी करते हैं.
आप शायद सभी काम और व्यवसाय बेहतरीन तरीके से कर लेते हैं. क्या बात है! आपकी
बुद्धि, और लगन से, और आपकी मिलनसारिता से!
‘अपने' इसके विपरीत, पहले ही आपके लिए अफ़सोस प्रकट करने लगते हैं, अविश्वास से सिर हिलाने लगते हैं, और कांव-कांव करने लगते
हैं.आप के बारे में उनकी पूर्वधारणाएं अच्छी नहीं हैं. और, इसके अलावा, आपकी लापरवाही, अस्तव्यस्तता, भुलक्कड
स्वभाव और मिलनसारिता के अभाव के बारे में जानते हुए, वे यह सिद्ध कर सकते हैं, कि अगर आप समय रहते नहीं
संभले, और अपने दिमाग से बेवकूफी भरे शौक नहीं निकाल
फेंके, तो आपको कई अप्रियताओं और दुखद परिणामों का सामना
करना पडेगा. ये एहसास कि ‘पराये' ‘अपनों' से कितने ज़्यादा प्यारे हैं, धीरे धीरे लोगों में घर करता जा रहा है, और मुझे दो बार इस पर यकीन करने का मौक़ा मिल चुका है.
एक बार – ये हुआ था, रेल के कम्पार्टमेंट में – कोई एक खडूस महाशय अपने
पड़ोसी पर चिल्ला रहे थे: “ये आप इतना पसर कर क्यों बैठे हैं? समझना चाहिए कि दूसरों को भी जगह चाहिए. अगर आप असभ्य आदमी
हैं, तो आपको कुत्तों के डिब्बे में जाना चाहिए, न कि
मुसाफिरों के. ये बात याद रखना!” और पड़ोसी ने उसे जवाब दिया, “अचरज की बात है! ज़िंदगी में
पहली बार मुझे देख रहे हैं, और ऐसे चिल्ला रहे हैं, जैसे मैं आपका सगा भाई हूँ! शैतान जाने, ये सब क्या है!”
दूसरी बार मैंने सुना जब एक जवान महिला अपने पति की तारीफ़ कर रही थी और कह रही
थी: “हमारी शादी को चार साल हो गए हैं, मगर वह हमेशा प्यार से, नम्रता से, बहुत ध्यान से पेश आते है, जैसे कोई अजनबी हो! और सुनने वाले भी इस अजीब प्रशंसा पर
चौंके नहीं. मुझे भी अचरज नहीं होता.
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