छह जून
लेखक : सिर्गेइ नोसव
अनुवाद : आ. चारुमति रामदास
मुझसे कहा गया है, कि मैं इस जगह को भूल जाऊँ – कभी भी यहाँ न आऊँ.
मगर, मैं आ गया.
काफ़ी कुछ बदल गया है, बहुत कुछ पहचान नहीं पा रहा हूँ, मगर इससे ज़्यादा
भी बदल सकता था और काफ़ी बृहत् – ग्रहीय! – पैमाने पर! – तब दरवाज़े की सिटकनी तोड़कर
मुझे बाथरूम में घुसना पड़ता!...
उम्मीद
है,
कि मुझे दस हज़ारवीं बार ये समझाने की ज़रूरत नहीं है, कि मैं क्यों बरीस निकलायेविच को
गोली मारना चाहता था.
बस हो
गया. खूब समझा चुका.
जब से
मुझे आज़ाद किया गया है, मैं एक भी बार मॉस्को एवेन्यू पर नहीं गया था.
मेट्रो-स्टेशन
“टेक्नोलॉजिकल इन्स्टीट्यूट” – यहाँ मैं बाहर निकला, और पैर मुझे ख़ुद-बख़ुद आगे
ले चले. सब कुछ बगल में ही है. फ़न्तान्का तक
(ये नदी है) धीमी चाल से छह मिनट. अबूखव्स्की ब्रिज. मैं और तमारा कोने वाली
बिल्डिंग में नहीं, बल्कि बगल में रहते थे – मॉस्को एवेन्यू
पर उसका नम्बर अठारह है. वाह : रेस्टॉरेन्ट “बिर्लोगा”! (‘बिर्लोगा’ शब्द का अर्थ है – माँद – अनु.). पहले यहाँ माँद-वाँद नहीं होती
थी. पहले यहाँ सुपर मार्केट था, उसमें तमारा सेल्स-गर्ल थी.
मैं “बिर्लोगा” में मेन्यू पर नज़र डालने के लिए घुसा. ख़ास कर भालू का माँस परोसा
जाता है. ठीक है.
अगर ये
“माँद” है,
तो “माँद” के ऊपर वाली बिल्डिंग के कमरे को, जहाँ
मैं तमारा के पास रहता था, “घोसला” कहना सही होगा.
अगर सब
कुछ किसी और तरह से हुआ होता तो माँद के ऊपर वाले हमारे घोसले में आज म्यूज़ियम
होता. छह जून वाला म्यूज़ियम. वैसे, मैंने म्यूज़ियम्स के बारे में सोचा
नहीं था.
आँगन में
आता हूँ,
वहाँ लिफ्ट की सहायता से, जो मज़दूर को तीसरी
मंज़िल तक की ऊँचाई तक ले गई है, चिनार के वृक्ष की क्रमश:
छिलाई हो रही है. मज़दूर आरा-मशीन से एक-एक करके मोटी टहनियाँ काट रहा है, उनकी छिलाई कर रहा है. मैं इस वृक्ष का सम्मान करता था. वह ऊँचा था. वह
अन्य वृक्षों की अपेक्षा जल्दी बढ़ता था, क्योंकि आँगन में
उसे धूप नहीं मिलती थी. सन् ’96 और ’97 में इस चिनार के नीचे ज़ंग लगे झूलों में बैठकर सिगरेट पिया करता था (
बच्चों के प्ले-ग्राउण्ड में आज ठूँठ बिखरे पड़े हैं). यहाँ मेरी मुलाकात
एमिल्यानिच से हुई. एक बार वह रेत के गढ़े के किनारे पर बैठा और, दवा की शीशी का ढक्कन खोलकर नागफ़नी का टिंचर गटक गया. मुझे एकान्त चाहिए
था इसलिए मैं उठकर जाने लगा, मगर उसने मुझसे मेरे राजनीतिक
विचारों के बारे में पूछा – हम बातें करने लगे. हमारे विचार समान थे. बरीस
निकलायेविच के बारे में, जैसा अक्सर होता है ( उस समय सभी उसके
बारे में बातें करते थे) और उस बारे में कि उसे मारना चाहिए. मैंने कहा, कि मैं न सिर्फ सपना देखता हूँ, बल्कि तैयार भी हूँ.
उसने भी कहा. उसने कहा कि कि वह एक अफ्रीकन देश में, जिसका नाम
ज़ाहिर करने का उसके पास फ़िलहाल अधिकार नहीं है, स्काऊट्स की
टुकड़ी का नेतृत्व कर चुका है, मगर जल्दी ही ज़ाहिर कर सकेगा,
और तब हम सबको मालूम हो जाएगा. पहले तो मुझे उस पर विश्वास नहीं
हुआ. मगर उसके पास ब्यौरा था. काफ़ी ब्यौरा था. विश्वास न करना असंभव था. मैंने कहा
कि मेरे पास मकारव है (मैंने दो साल पहले ही एफीमव स्ट्रीट के पीछे ख़ाली मैदान में
ख़रीदा था). कईयों के पास हथियार थे – हम, हथियारों के मालिक,
उसे करीब-करीब छुपाते नहीं थे. ( ये सच है, कि
तमारा को मालूम नहीं था, मैंने मकारव को सिंक के नीचे पाईप
के पीछे छुपा दिया था). एमिल्यानिच ने कहा, कि मुझे मॉस्को
जाना पड़ेगा, प्रमुख घटनाएँ वहीं होती हैं – वहाँ ज़्यादा
संभावनाएँ हैं. मैंने कहा कि मेरी खिड़कियाँ मॉस्को एवेन्यू पर खुलती हैं. और
मॉस्को एवेन्यू से अक्सर सरकारी डेलिगेशन्स गुज़रते हैं. ग़ौर तलब है, कि पिछले साल मैंने खिड़की से प्रेसिडेन्ट की कारों का काफ़िला देखा था,
उस समय बरीस निकलायेविच पीटर्सबुर्ग में आया था – चुनाव नज़दीक आ रहे थे.
हम इंतज़ार करेंगे, और राह देखेंगे, वह
फ़िर आएगा. मगर, एमिल्यानिच ने कहा, आख़िर
तुम खिड़की से तो गोली नहीं चलाओगे, उनकी गाड़ियाँ बुलेट-प्रूफ़
होती हैं. मुझे मालूम था. मैंने, बेशक, कहा, कि नहीं चलाऊँगा. किसी और तरह से करना होगा,
एमिल्यानिच ने कहा.
इस तरह
मेरी उससे मुलाकात हुई.
मगर, अब
तो चिनार भी नहीं रहेगा.
एमिल्यानिच
गलत सोच रहा था,
जब उसने ये फ़ैसला कर लिया (उसने शुरू में ऐसा सोचा था), कि मैं अपनी तमारा के साथ सिर्फ इसलिए रहता हूँ, क्योंकि
यहाँ से मॉस्को एवेन्यू दिखाई देता है. इन्वेस्टिगेटर का, भी
यही ख़याल था. बकवास! पहली बात, मैं ख़ुद भी समझता था, कि खिड़की से गोली चलाने में कोई तुक नहीं है, और अगर
घर से निकलकर नुक्कड़ तक जाऊँ, जहाँ अक्सर सरकारी गाड़ियों का
काफ़िला फन्तान्का की ओर मुड़ने से पहले रफ़्तार कम करता है, बख़्तरबन्द
कार पर गोली चलाने में कोई तुक नहीं है. मैं कोई पूरा पागल, सिरफ़िरा
नहीं हूँ. हाँलाकि, ये मानना पड़ेगा, कि
मैं कभी-कभी अपनी कल्पना को खुली छोड़ देता था. कभी-कभी, स्वीकार
करना पड़ेगा, कि मैं कल्पना करता था, कि
कैसे रफ़्तार कम हुई कार के पास भागकर, गोली चला रहा हूँ,
काँच की ओर निशाना साधते हुए, और मेरी गोली
ठीक निशाने पर लगती है, और बस, पूरा
शीशा चकनाचूर...और पूरा शीशा चकनाचूर...और पूरा शीशा चकनाचूर...
मगर, ये
थी पहली बात.
और अब
दूसरी.
मैं
तमारा से प्यार करता था. और ये, कि खिड़कियाँ मॉस्को एवेन्यू पर
खुलती हैं – ये इत्तेफ़ाक था.
वैसे, मैंने
उन्हें एमिल्यानिच का नाम नहीं बताया, सब कुछ अपने ऊपर ले
लिया.
मुझसे
कहा गया है,
कि तमारा को याद न करूँ.
नहीं
करूँगा.
मेरी
उससे मुलाकात हुई...मगर, वैसे, आपको इससे क्या
फ़र्क पड़ता है.
उससे
पहले मैं व्सेवलोझ्स्का में रहता था, ये पीटर्सबुर्ग के पास है. जब
तमारा के यहाँ मॉस्को-एवेन्यू पर आ गया, तो व्सेवलोझ्स्का
वाला फ्लैट बेच दिया, और उन पैसों को फ़ाइनान्शियल-पिरामिड (पोंज़ी
स्कीम – अनु.) में लगा दिया. काफ़ी सारे फ़ाइनान्शियल-पिरामिड्स थे.
मैं
तमारा से ख़ूबसूरती के लिए प्यार नहीं करता था, जो उसमें, ईमानदारी से कहूँ तो, दिखाई ही नहीं देती थी,
और इसलिए भी नहीं, कि समागम के दौरान वह ज़ोर
से मदद के लिए पुकारती थी, अपने पुराने प्रेमियों के नाम
पुकारते हुए. मैं ख़ुद भी नहीं जानता कि मैं तमारा से क्यों प्यार करता था. वो भी
मुझे प्रत्युत्तर देती थी. उसकी स्मरण शक्ति बेहद अच्छी थी. मैं अक्सर तमारा के
साथ ‘स्क्रेबल्स’ खेलता था, इस खेल का
एक और नाम है “एरूडाइट” अक्षरों को खेल वाले बोर्ड पर रखकर उनसे शब्द बनाना होता
था. तमारा मुझसे अच्छा खेलती थी. नहीं, मैं कभी भी हारता
नहीं था. मैंने उससे कई बार कहा, कि उसे किसी साधारण
डिपार्टमेन्टल स्टोअर्स के ‘मछली-विभाग’ में नहीं, बल्कि नेव्स्की पर स्थित किसी किताबों की
दुकान में काम करना चाहिए, जहाँ शब्दकोश और आधुनिकतम साहित्य
मिलता है. ये आजकल लोग नहीं पढ़ते हैं. मगर उस समय काफ़ी पढ़ते थे.
पैर
ख़ुद-ब-ख़ुद,
मैंने कहा ना, यहाँ ले आए. देर-सबेर मुझे यहाँ
आना ही था, चाहे मुझे इस बारे में याद करने से कितना ही
क्यों न मना किया जाए, मैं यहाँ आ ही जाता.
बस उन दो
सालों में,
जब मैं तमारा के साथ रहता था चिनार बढ़ गया, चिनार
के पेड़ जल्दी बढ़ते हैं, वे भी, जो पूरी
तरह बड़े प्रतीत होते हैं. उनकी चोटी बढ़ती है, अगर मैंने सही
तरह से न समझाया हो तो. अब समझ में आया? और जब देखते हो,
कि कैसे तुम्हारी आँखों के सामने कोई चीज़ धीरे-धीरे बदलती है – एक
या डेढ़ साल के दौरान, तब ये अंदाज़ लगाते हो, कि – इनके साथ-साथ. तुम ख़ुद भी बदल रहे हो. वो बदल रहा था, और मैं भी बदल रहा था, और चारों ओर की हर चीज़ बदल
रही थी, और अच्छी दिशा में बिल्कुल नहीं, - हर चीज़, जो सिर्फ बढ़ रही थी, जैसे
चिनार के पेड़ बढ़ते हैं – ख़ासकर वे, जिन्हें पर्याप्त धूप
नहीं मिलती...संक्षेप में, मैं ख़ुद भी नहीं जानता था,
कि चिनार मेरे दिल के करीब है, और ये बात,
कि वो मेरे करीब है, मैं सिर्फ अभी समझा हूँ,
जब देखा कि उसे काट रहे हैं. इतने सालों के बाद इस पते पर क्या
सिर्फ यही देखने के लिए आना था, कि चिनार को कैसे काट रहे
हैं! मेरे भीतर यादें जाग उठीं. वे ही, जिनके बारे में मुझे
परेशान होना मना था.
उसकी
तनख़्वाह काफ़ी कम थी, मेरी भी (मैं ऑर्डर पर टी.वी. सुधारता था –
पुराने, सोवियत काल के, लैम्प वाले,
उस समय वे बदले नहीं थे, मगर छह जून उन्नीस सौ
सत्यानवें को सुधारना बंद हो गया था – ऑर्डर मिलने बन्द हो गए थे). मतलब, हम एक साथ रहते थे.
एक बार
मैंने उससे पूछा (“एरूडाइट” खेलते हुए), कि क्या वह बरीस निकलायेविच
पर हमला करने के काम में भाग लेगी. तमारा
ने पूछा : मॉस्को में? नहीं, जब वह
सेंट-पीटर्सबुर्ग आएगा. ओ, ये कब होने वाला है! – तमारा ने
कहा. फिर उसने मुझसे पूछा, कि मैं इस सबके बारे में क्या
सोचता हूँ. मेरी कल्पना इस तरह की थी. मॉस्को-एवेन्यू पर काली गाड़ियाँ जा रही हैं.
फ़न्तान्का पर मुड़ने से पहले, वे परम्परानुसार (आवश्यकतानुसार
नहीं) ब्रेक लगाती हैं. उसकी गाड़ी के सामने तमारा भागते हुए आएगी, घुटनों के बल गिरेगी, आसमान की तरफ़ हाथ उठाएगी.
प्रेसिडेन्ट की गाड़ी रुकेगी, परेशान बरीस निकलायेविच ये पूछने के लिए बाहर आएगा, कि क्या हुआ है और वह कौन है. और तभी मैं – पिस्तौल लिए. गोली चलाता हूँ,
गोली चलाता हूँ, गोली चलाता हूँ, गोली चलाता हूँ...
तमारा ने
जवाब दिया,
कि शुक्र है, मेरे पास पिस्तौल नहीं है,
और यहाँ वह गलत थी : ख़ुशकिस्मती हो या बदकिस्मती, मगर मकारव बाथरूम में पड़ी थी, सिंक के नीचे पाइप के
पीछे, वहीं पर बारह कारतूस भी थे – पॉलिथिन की बैग में,
मगर तमारा उस बारे में कुछ भी नहीं जानती थी. मगर उसे इस बात का
यकीन था, कम से कम मुझे तब ऐसा लगा था, कि अगर वह काफ़िले के सामने कूद जाए, तो कोई भी नहीं
रुकेगा. और अगर प्रेसिडेन्ट की कार रुक भी जाए, तो भी बरीस
निकलायेविच बाहर नहीं निकलेगा. मैं भी यही
सोचता था : बरीस निकलायेविच बाहर नहीं
निकलेगा.
मैं
सिर्फ तमारा को आज़माना चाहता था, कि वह मेरे साथ है या नहीं.
फिर उसने
मेरे चेहरे पर लैम्प की रोशनी डालते हुए पूछा : क्या मैं तमारा से प्यार करता था? न
जाने क्यों बाद में इस सवाल में न सिर्फ ग्रुप के प्रमुख को, बल्कि मुझसे पूछताछ कर रहे पूरे ग्रुप को दिलचस्पी हो गई. हाँ, प्यार करता था. वर्ना इस शोरगुल वाले, गंधाते मॉस्को
एवेन्यू पर दो साल नहीं खींचता, चाहे सिर्फ एक ही – बरीस
निकलायेविच को मारने के, जुनून से जीता.
असल में
मेरे दो जुनून थे – तमारा से प्यार और बरीस निकलायेविच से नफ़रत.
दो
बेहिसाब जुनून – तमारा से प्यार और बरीस निकलायेविच से नफ़रत.
और अगर
मैं प्यार न करता,
क्या वह मुझसे कहती “ईगल”, “मेरे जनरल”,
“छुपा-रुस्तम”?...
उस समय
कई लोग बरीस निकलायेविच को मारना चाहते
थे. और कईयों ने मार भी डाला – ख़यालों में. ख़यालों में तो सभी उसे मार रहे थे. सन्
सत्तानवे. पिछले साल चुनाव हुए थे. माफ़ कीजिए, बिना इतिहास में जाए – नहीं
चाहता. या किसी को मालूम नहीं है कि वोटों की गिनती किस तरह हुई थी?
मॉस्को-एवेन्यू, 18 के आँगन में, तब मैं काफ़ी लोगों से बातें करता था,
और सब एक सुर से इसी बात पर ज़ोर देते थे, कि
सन् उन्नीस सौ छियानवे में उन्होंने बरीस निकलायेविच को वोट नहीं दिया था. मगर ये – हमारे आँगन में.
और अगर पूरे देश को लिया जाए तो? सिर्फ मैं चुनाव में नहीं
गया था. क्यों जाना है, जब इसके बिना
ही काम चल जाता है?
उसका
ऑपरेशन किया गया,
अमेरिकन डॉक्टर ने हार्ट की बाइपास सर्जरी की थी.
ओह, मुझसे
कहा गया है, कि मैं ये भूल जाऊँ.
मैं भूल
गया.
मैं चुप
रहता हूँ.
मैं शांत
हूँ.
तो...
तो, मैं
तमारा के साथ रहता था.
अख़बारों
में पिछले कुछ समय से ऑपरेशन टेबल पर उसकी मृत्यु की संभावनाओं की चर्चा हो रही
थी.
और मुझे
ख़ुद भी याद है,
कि कैसे एक अख़बार में, याद नहीं कौन से,
मुझे और मेरे जैसे कई लोगों को चेतावनी दी गई थी कि जीवन की योजना
को उसकी मृत्यु की उम्मीद से न जोडें.
मगर मैं
अपने निर्णय के उद्देश्य से दूर नहीं हटना चाहता.
और जहाँ
तक तमारा का सवाल है...
मॉस्को
एवेन्यू से दो कदम पर है – सेन्नाया चौक. उस समय तक कबाड़ी बाज़ार का कुछ हिस्सा
वहाँ से हटाया जा चुका था, मगर दुकानदार की ओर जाती हुई कड़ी
को महसूस कर सकते थे. ये उस बात पर निर्भर करता था, कि किस
दुकानदार की ज़रूरत है. यहाँ तात्पर्य है, अगर कोई अब तक नहीं
समझ पाया हो तो – उस चीज़ के दुकानदार से, जिससे गोली चलाई
जाती है.
उस तरह
का दुकानदार मुझे उस समय मिल भी गया ख़ाली मैदान में, जहाँ एफ़ीमवा स्ट्रीट
सेन्नाया चौक से मिलती है.
संक्षेप
में,
ये तो नहीं कह सकता कि एमिल्यानिच हर बात में मेरा समर्थन करता था,
मगर हम साथ-साथ थे. सिर्फ वह पीता बहुत था, और
बेहद ख़राब किस्म की शराब. वह उन्हें वितेब्स्क स्टेशन के पास वाले स्टाल से ख़रीदता
था.
एक बार
उसने कहा कि उसके पीछे एक पूरी ऑर्गेनाइज़ेशन है. और उसे इस ऑर्गेनाइज़ेशन में शामिल
कर लिया गया है.
हमारी
ऑर्गेनाइज़ेशन में वह मुझसे एक सीढ़ी ऊपर था, जिसके परिणाम स्वरूप औरों
को भी जानता था - हमारी ऑर्गेनाइज़ेशन के. मगर मैं सिर्फ एमिल्यानिच को जानता था.
वह पड़ोस वाली बिल्डिंग में रहता था, बिल्डिंग नं. 16 में.
उसकी खिड़कियाँ चौराहे पर खुलती थीं, और यदि बरीस निकलायेविच प्रकट
होता तो वह खिड़की से ज़्यादा अचूक निशाना लगा सकता था. हाँलाकि, बात ये थी, कि हमने कार पर गोली चलाने का प्लान नहीं
बनाया था. अगर कार बख़्तरबन्द है, तो उस पर गोली क्यों चलाई
जाए? इसमें कोई तुक नहीं है. ये आत्मघाती और पूरी योजना को नष्ट
करने वाला होता. उस समय मैं ऐसा सोचता था, और एमिल्यानिच भी.
मगर मैं इस बारे में, शायद, बता चुका
हूँ.
और वो, जिसके
बारे में मैंने अभी तक बताया नहीं है : हमारा एक अलग प्लान था.
सन् 1997
का जून प्रारंभ हुआ.
पाँच जून
को,
बरीस निकलायेविच के पीटर्सबुर्ग पहुँचने के एक दिन पूर्व, एमिल्यानिच ने मुझसे कहा, कि बरीस निकलायेविच कल आ
रहा है. मुझे पता था. हर कोई, जिसे राजनीति में थोड़ी भी
दिलचस्पी थी, जानता था.
प्रेसिडेन्ट
पीटर्सबुर्ग में पूश्किन के जन्म की 198वीं जयन्ती मनाना चाहते थे.
अलेक्सान्द्र
सिर्गेयेविच पूश्किन – हमारे राष्ट्र-कवि.
मैं हमला
करने के लिए तत्पर था.
एमिल्यानिच
ने मुझसे कहा,
कि ऑर्गेनाइज़ेशन के नेतृत्व ने प्लान तैयार कर लिया है. कल शाम,
याने छह जून को, प्रेसिडेन्ट मरीन्स्की थियेटर
जाएँगे, जिसे पहले कीरव – ऑपेरा और बैले थियेटर कहते थे.
मुझे पहले ही स्टेज के पीछे ले जाया जायेगा. बरीस निकलायेविच पहली पंक्ति में
होगा. और आगे, जैसा स्तलीपिन को मारा गया था.
वो, जिससे
गोली चलाते हैं, मैंने ख़रीद लिया था, मगर,
अपने पैसों से, न कि ऑर्गेनाइज़ेशन के पैसों से,
जिससे एमिल्यानिच, मेरी अपेक्षा, ज़्यादा गहरे जुड़ा हुआ था.
मैं
करियर में तरक्की के बारे में थोड़ी न सोच रहा था!
और तमारा
का क्या?
उसका तो बरीस निकलायेविच के
नाम से ही जी मिचलाता था. तमारा ने मुझसे कहा था कि उसके बारे में बात न करूँ. सच
बताऊँ : वह डरती थी कि बरीस निकलायेविच के
प्रति मेरी नफ़रत, हम दोनों के बीच के प्यार को कम कर देगी.
और, कहीं तो वह ठीक थी. सही है, कि
डरती थी. तमारा के प्रति प्यार के मुकाबले, मैं बरीस
निकलायेविच के प्रति अपनी नफ़रत को ज़्यादा
शिद्दत से याद करता हूँ. और मैं सचमुच में प्यार करता था...कितना प्यार करता था
मैं तमारा से!...
वैसे, मेरी
याददाश्त भी अच्छी ही है.
गोशा, आर्थर,
ग्रिग्रोरियान, उलीदव, कोई
एक “वान्यूशा”. कुरापात्किन, सात और...
नाम, कुलनाम,
उपनाम. मैंने कुछ भी नहीं छुपाया.
एमिल्यानिच
का नाम मैंने नहीं लिया और खोजकर्ताओं को ऑर्गेनाइज़ेशन के बारे में भी कुछ नहीं
बताया.
एमिल्यानिच
तमारा का प्रेमी नहीं था.
और उन्हें
– सबको. आख़िर इतना ज़ोर से चिल्लाने की ज़रूरत क्या थी? पहले
तो खोजकर्ताओं ने उसे मेरा साथी समझा. उन्हें संबंधों के नेटवर्क में रुचि थी.
ख़ुद ही
सुलझाने दो,
अगर चाहते हैं तो.
मेरा
मामला नहीं है. मगर उनका काम है.
सामने
वाले छोटे-से पार्क में मैं बगल वाली बिल्डिंग में रहने वाले आदमी से मिला, इस
आदमी को मुझे एमिल्यानिच ने दिखाया था, उसने कहा था कि पड़ोसी
है.
एमिल्यानिच
का पड़ोसी लेखक था. दाढ़ी वाला, शेर्लोक होम्स जैसी कैप में,
वह अक्सर बेंच पर बैठता था.
मुझे
लगता है,
कि वह पागल था. मेरे इस सवाल पर कि क्या वह बरीस निकलायेविच को मार सकता है, उसने जवाब
दिया कि वह और बरीस निकलायेविच अलग-अलग दुनिया के हैं.
मैंने
उससे पूछा : आप किसके साथ हो, संस्कृति के जादूगरों? वह सवाल ही नहीं समझ पाया. नहीं,
नहीं, मुझे
याद आया. मुझे याद आया, कि कैसे गर्बाचोव के पेरेस्त्रोयका
के अस्त पर लेखकों का एक बड़ा समूह बरीस निकलायेविच के पास क्रेमलिन गया, प्रेसिडेंट को अपना समर्थन प्रकट करने. और उनके बीच एक भी ऐसा नहीं था,
जो बरीस निकलायेविच पर कम से कम काँच की ऐश-ट्रे ही फेंकता!... और
वे थे कुल चालीस आदमी – ये हुई कोई संख्या! और शायद, उनके
पास कोई हथियार है अथवा नहीं, इसकी जाँच नहीं की गई!...कोई
भी ले जा सकता था!...और अब, इस समय, मैं
पूछता हूँ : वलेरी गिओर्गिएविच, आप पिस्तौल क्यों नहीं ले गए
और बरीस निकलायेविच पर गोली क्यों नहीं चलाई? कोई जवाब नहीं
सुनाई देता. और मैं पूछता हूँ : व्लदीमिर कन्स्तान्तीनविच, आप
पिस्तौल क्यों नहीं ले गए और बरीस निकलायेविच पर गोली क्यों नहीं चलाई? और जवाब नहीं सुनाई देता. मैं औरों से भी पूछता हूँ – वे चालीस थे! – मगर
जवाब नहीं सुनाई देता! जवाब नहीं सुनाई देता! किसी के भी मुँह से जवाब नहीं सुनाई
देता!
और ये, जो
कैप पहने पार्क में था, वह मुझसे कहता है, कि उसे बुलाया नहीं गया था.
और अगर
बुलाया जाता,
तो क्या तुम बरीस निकलायेविच पर गोली चलाते?
तू है
कौन,
जो तुझे बुलाया जाता? तूने ऐसा क्या लिखा है,
तुझे बुलाया जाता और तू बरीस निकलायेविच पर गोली चलाता?
आख़िर, जो
तू लिखता है, उसकी ज़रूरत किसे है, अगर
हर चीज़ अपने क्रम से होती है और इस क्रम को ऊपरी फ़ैसले से तय किया जाता है?
कभी-कभी
मेरा भी दिल चाहता कि लेखक बन जाऊँ. आख़िर बरीस निकलायेविच को शायद समर्थन की ज़रूरत पड़े, और
शायद वह क्रेमलिन में नये लोगों को, और मैं उनमें से एक
रहूँगा, पतलून में (बेल्ट के पीछे),
पिस्तौल के साथ (ओ, ख़तरनाक शब्द!) – कहीं पतलून में बेल्ट के
पीछे छिपी पिस्तौल के साथ, और क्या “प्रिय रूसियों...” सुनते ही पल भर में अपनी पिस्तौल नहीं निकालूँगा ?...क्या ऐसा नहीं करूँगा?
ओ, इसी
की ख़ातिर मैं लिखता!... जो जी में आये, लिखता, सिर्फ इसलिए कि मुझे आमंत्रितों की सूची में स्थान मिले!
जहाँ तक
पिस्तौल का सवाल है, मैंने उसे टॉयलेट में छुपा दिया, सिंक के नीचे वाले पाइप के पीछे.
तमारा को
मालूम नहीं था.
हाँलाकि
मैंने कई बार कहा,
कि वह पेट में गोली खाने के लायक है, और वह,
जैसे मुझसे सहमत थी.
एमिल्यानिच
का नाम मैंने नहीं लिया और ऑर्गेनाइज़ेशन का भी नहीं, जो उसके पीछे थी.
खोज
दूसरी दिशा में जा रही थी.
गोशा, आर्थर,
ग्रिगोरियान, उलीदव, कोई
“वन्यूशा”, कुरापात्किन, और अन्य
सात...
कैप वाले
लेखक को भी मैंने जोड़ लिया.
छह जून
की सुबह थी. मैं अभी घर में ही था. ख़यालों में मैं शाम के कारनामे की तैयारी कर
रहा था. मगर सफ़लता के बारे में नहीं सोच रहा था.
नौ बजे
फोन-कॉल करना तय हुआ था. नौ, सवा नौ, मगर
वह फोन नहीं करता. एमिल्यानिच फोन क्यों नहीं कर रहा है?
साढ़े नौ
बजे मैंने ख़ुद ही फ़ोन किया.
उसने बड़ी
देर तक रिसीवर नहीं उठाया. आख़िरकार उठाया, सम्पर्क किया. मैंने परिचित
आवाज़ सुनी और समझ गया कि वह भयानक नशे में है. मेरा दिमाग़ अपने कानों पर विश्वास
नहीं करना चाहता था. ऐसा कैसे हो सकता है? बरीस निकलायेविच तो
बस पहुँचने ही वाला है! तुमने हिम्मत कैसे की, तुम कर कैसे
सके?...शांत हो जाओ, सब बदल गया है.
ऐसे कैसे बदल गया है? क्यों बदल गया है? ‘शो’ ही नहीं होने वाला है, एमिल्यानिच
ने कहा. “सुनहरा मुर्गा” मर गया है. मतलब ऑपेरा. (या बैले?)
मैं इस
विश्वासघात पर चिल्लाया.
“शांत
हो जाओ,” एमिल्यानिच ने मुझसे कहा, “अपने
आप पर काबू रखो. फिर मौका आयेगा. मगर आज नहीं.”
पूरी
सुबह मैं बेचैन रहा.
हमारे
नीचे वाले डिपार्टमेंटल-स्टोअर में सफ़ाई का दिन था. सुबह से कॉक्रोच मार रहे थे, और
सेल्स गर्ल्स को छुट्टी दे दी गई. तमारा आई, उससे
कॉक्रोच-मार दवा की बू आ रही थी.
मॉस्को
एवेन्यू पर,
मैंने अभी तक नहीं बताया, काफ़ी ज़्यादा ट्रैफ़िक
होता है. शोर होता रहता है. दो सालों में, जो मैंने तमारा के
साथ गुज़ारे थे, मुझे इस शोर की आदत हो गई थी.
मैं कमरे
में था. मुझे याद है (हाँलाकि बाद में मेरे याद करने पर पाबंदी लगा दी गई), कि
मैं फूलों में पानी डाल रहा था. कैक्टस के. तमारा उस समय नहा रही थी. और तभी हमारे
यहाँ बाहर से शोर आना बंद हो गया. मतलब – खिड़कियों के पीछे से. मगर बाथरूम में शोर
हो रहा था – शॉवर का. मगर खिड़कियों के बाहर – ख़ामोशी : गाड़ियों का आना-जाना रुक
गया.
इसका
मतलब सिर्फ एक ही हो सकता था : बरीस निकलायेविच के लिए रास्ता ख़ाली कर दिया गया. वह आ गया है और
जल्दी ही हमारे चौराहे तक पहुँच जाएगा. मुझे तो मालूम था कि वह आने वाला है. और, पहले
वाले प्लान के मुताबिक, मुझे आज की शाम उसे ऑपेरा में (या,
याद नहीं, बैले में?)
ख़त्म कर देना था...
मगर अब
तो बैले (या ऑपेरा?) नहीं होगा.
“सुनहरा
मुर्गा”,
एमिल्यानिच ने कहा था.
मतलब, मैं
खिड़की के पास हूँ. मॉस्को एवेन्यू की ख़ामोशी में. पुलिस वाले उस तरफ़ खड़े हैं. और
कोई ट्रैफ़िक नहीं है. इंतज़ार कर रहे हैं. लो, पुलिस की
मर्सिडीज़ आई (या, मर्सिडीज़ से बड़ी?) आई
– प्रेसिडेन्ट की गाड़ी को गुज़ारने की तैयारी का जायज़ा लेने. वे हमेशा इसी तरह
तैयारियों का जायज़ा लेने के लिए गाड़ी भेजा करते थे.
मगर फिर
भी,
पिस्तौल लेकर बाहर निकलना चाहिए. मेरी अंतरात्मा मुझसे यही कह रही
थी. मगर अंतरात्मा की दूसरी आवाज़ ये कह रही थी : पिस्तौल न ले, सिर्फ बाहर निकल और देख, और पिस्तौल का, तू ख़ुद भी जानता है, कोई फ़ायदा नहीं होगा.
फिर भी
मैंने पिस्तौल लेने का फ़ैसला किया. मगर तमारा शॉवर के नीचे नहा रही थी.
तमारा, जब
शॉवर के नीचे होती थी, तो बोल्ट लगाकर अपने आप को मुझसे छुपा
लेती थी. अप्रैल में कभी उसने ऐसा करना शुरू किया. उसका ख़याल था, कि अगर फ़व्वारा आवाज़ करता, तो मुझे उत्तेजित कर देता
था – वह भी बेहद. मगर ऐसा नहीं था. हर हाल में, ऐसा था नहीं,
जैसा उसे लगता था.
अप्रैल
में हमारे साथ ऐसी एक घटना हुई थी जिसे समझाना लगभग असंभव है.
तबसे वह
अपने आप को छुपाने लगी थी.
मगर मैं
तो कुछ और कह रहा हूँ, यह फ़ालतू बाथरूम कहाँ से बीच में टपक पड़ा?
हाँ, अपनी
गुप्त जगह को याद करके, मैं बाथरूम की ओर भागा और दरवाज़ा
खटखटाया. मैं ज़ोर से चिल्लाया: खोलो!
“फ़िर से?” तमारा ने धमकी भरी आवाज़ में पूछा ( आवाज़ में जानबूझकर धमकी भरी थी). ये
मुझसे : “रुको! शांत हो जाओ!”
“खोलो, तमारा!
एक भी सेकण्ड बरबाद नहीं कर सकता!”
“रुको!
नहीं खोलूँगी!”
मगर वह
तो नहीं जानती थी,
कि मेरी पिस्तौल वहाँ पाइप के पीछे छ्पाई गई है.
और अगर
जानती होती तो?
और वैसे
भी,
उसे क्या मालूम था? उसके दिमाग़ में क्या चलता
था? वह किस बारे में सोचती थी? उसे तो
मेरे बारे में कुछ भी नहीं मालूम था! नहीं जानती थी, कि मैं बरीस
निकलायेविच को मारना चाहता हूँ. और ये,
कि बाथरूम में मेरी गुप्त जगह है!
और अगर
मैं सचमुच में पानी के शोर से इतना उत्तेजित हो जाता, तो
क्या मैं दरवाज़ा नहीं तोड़ देता? हाँ, मैं
उसे बाएँ कंधे से तोड़ देता! उस अप्रैल वाली घटना के बाद उसके इस शॉवर के दौरान
बाथरूम में उसके पास घुस जाने की काफ़ी संभावनाएँ थीं! मगर मैंने कभी भी सिटकनी
नहीं तोड़ी – और, तब, मैं कहाँ से
उत्तेजित हुआ था?
बल्कि, वही
मुझे जानबूझ कर इस बोल्ट से उकसा रही थी (मैंने बाद में अंदाज़ लगाया).
मगर, मैं
कुछ और कह रहा हूँ.
मैं
बोल्ट तोड़ देता,
अगर मेरे भीतर – दूसरी, न कि पहली आवाज़ न
होती. रुको. बाहर जाओ और उत्तेजना प्रकट न करो. तुम्हें पिस्तौल की ज़रूरत नहीं है.
प्लान बदल गया है. इसलिए बाहर जाओ और देखो. सिर्फ वहाँ मौजूद रहो. जब तक वह गुज़र
नहीं जाता.
मैं वैसे
ही घर की चप्पलों में भागा, जिससे कि एक भी सेकण्ड न खोऊँ.
घर से तो
मैं भागते हुए निकला था, मगर आँगन में साधारण चाल पर आ गया. आराम से
प्रवेश द्वार से बाहर आया. बरीस निकलायेविच अभी तक गुज़रा नहीं था. पैदल चलने वाले फुटपाथ पर
आ-जा रहे थे. वे हमेशा की ही तरह चल रहे थे. कुछेक लोग रुक कर मॉस्को एवेन्यू का
नज़ारा देखने लगे. दूर, अबवोद्नी कॅनाल के उस पार तुर्की
युद्ध में विजय का स्मारक, ‘विक्टरी ग़ेट’ नज़र आ रहा था.
अक्सर, जब
कोई राजनेता गुज़रते थे, तो सड़कें करीब दस मिनट पहले बंद कर
दी जाती थीं, मतलब अभी काफ़ी समय था.
फ़न्तान्का
वाले किनारे की ओर ट्रैफ़िक रोक दिया गया था. वहाँ गाड़ियाँ खड़ी थीं, मगर
जहाँ मैं खड़ा था, वहाँ से मैंने उन्हें नहीं देखा.
खाली
एवेन्यू की ओर देखना बड़ा अजीब लगता है. एवेन्यू का खालीपन आत्मा को व्याकुल कर रहा
था. एक भी पार्क की हुई गाड़ी नहीं थी. सब कुछ हटा दिया गया है.
एक और
पुलिस की गाड़ी गुज़री.
और
मॉस्को एवेन्यू से फ़न्तान्का की ओर, मतलब बाईं ओर मुड़ी – वहाँ सब कुछ खाली था.
बरीस
निकलायेविच इसी मार्ग से गुज़रेगा, यह
किसी के लिए रहस्य की बात नहीं थी. यही एक रास्ता है.
मैंने LIERT की (लेनिनग्राद इन्स्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स ऑफ
रेल्वे टेलिकम्युनिकेशन्स) जिसका हाल ही नाम बदलकर PSUPC (पीटर्सबुर्ग
स्टेट युनिवर्सिटी ऑफ़ पाथ्स ऑफ कम्युनिकेशन्स) कर दिया गया है – छत की ओर देखा –
कहीं स्नाइपर्स तो नहीं हैं?
शायद
नहीं थे.
उस जगह
की रचना – ऐसी थी. दाईं ओर – फ़न्तान्का से होकर गुज़रता हुआ पुल, जिसका
नाम है – अबूखव्स्की ब्रिज. उस पार बाग, ट्रैफ़िक सिग्नल,
पुलिस वाले का बूथ. ख़ास आकर्षण – ऊँचा मील का पत्थर संगमरमर के
स्मारक स्तंभ जैसा – कहते हैं, कि अठारहवीं शताब्दी में यहाँ
पर फन्तान्का से होते हुए शहर की सीमा रेखा गुज़रती थी.
इन
घटनाओं का एक-एक मिनट नहीं, बल्कि एक-एक सेकंड याद है. ये – जा
रहे हैं : मॉस्को एवेन्यू से के नज़दीक आ रहे हैं. प्रेसिडेन्ट की कार सबसे आगे
नहीं थी, और उसने, जो सबसे आगे थी,
मेरे सामने आकर गति कम कर दी
- आगे बाईं ओर उसे मुड़ना है. मैं, बेशक, प्रेसिडेन्ट की कार की ओर देख रहा हूँ – सिर्फ मैं ही नहीं, बल्कि दूसरे लोग भी देख रहे हैं, और अन्य आने-जाने
वाले भी – मैं देख रहा हूँ और सोच रहा हूँ, क्या ये सच है, कि वहाँ वो बैठा है, हो सकता है, वह दूसरी गाड़ी में हो, और इसमें – झूठ-मूठ का पुतला ...झूठ-मूठ का पुतला सचमुच के बख़्तरबंद काँच
के पीछे? और ये, मैं देखता हूँ उसका हाथ,
बेशक, उसका, मूक अभिवादन
करते हुए हौले से हिलता हुआ – काँच के पीछे, जहाँ पीछे वाली
सीट है, - और ये, वो किसका अभिवादन कर
रहा है, कहीं मेरा तो नहीं? मेरा ही
अभिवादन कर रहा है! जब वह मेरे बिल्कुल पास आ गया.
ब्रेक
लगाते हुए. धीमी होते हुए. (आगे मोड़ है.)
मगर फिर
कुछ अविश्वसनीय-सा हुआ.
उसके
रास्ते को काटती हुई किसी की परछाईं उछली. मैं फ़ौरन समझ ही नहीं पाया, कि
ये कौन है – आदमी या औरत. और जब देखा, कि औरत है, तो तुरंत मेरे दिमाग में ख़याल आया, कि कहीं ये मेरी
तमारा ही तो नहीं है. उसने मेरे सुझाव को मान तो नहीं लिया?
जैसे ही
तमारा का ख़याल आया, दिल की धड़कन रुक गई.
मगर ये
तमारा कैसे हो सकती है, जब कि उसे शॉवर के नीचे होना चाहिए? नहीं, बेशक, वो तमारा नहीं थी.
इसके बाद
और भी अविश्वसनीय घटना हुई – गाड़ी रुक गई.
और उसके
पीछे-पीछे दूसरी गाड़ियाँ भी – और पूरा काफ़िला. और आगे – और भी अविश्वसनीय : वह
बाहर आया.
दरवाज़ा
खुला और वह बाहर आया!
छह जून
उन्नीस सौ सत्तानवें का दिन था.
वह मुझसे
दस कदम दूर था,
और वह औरत भी – करीब पन्द्रह कदम की दूरी पर थी!
इस बात
की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती! मगर ऐसा हुआ था! वह बाहर आया और औरत की ओर बढ़ा!
और उसके
सभी चापलूस अपनी-अपनी गाड़ियों से निकलकर एक साथ उस औरत के पास जाने लगे.
गवर्नर!
वह भी निकला!
और
चुबाइस भी निकला!
ओह, आप
नहीं जानते कि चुबाइस कौन है? मुझसे कहा गया है, कि इस नाम को भूल जाऊँ! मगर कैसे भूलूँ, जब याद है?
आख़िर कैसे भूलूँ?
और दर्शक, आने-जाने
वाले, वे भी उसके नज़दीक जाने लगे, और
उनके साथ-साथ मैं भी!...मैं – अनजाने में ही – औरों के साथ – कदम-कदम – और नज़दीक,
और नज़दीक – उसकी ओर!...
जैसे ये
सब अभी नहीं,
बल्कि इससे पहले किसी ज़माने में हुआ था!
पहले ही
जैसे -
कुछेक घटनाएँ तब हुई तो थीं – जब वह लोगों से बातें करता था!
प्लान्ट में, रास्ते पर, कहीं और भी...
उसने
निडरता से लोगों से बातें की!
मैं सुन
रहा था – हम सब सुन रहे थे – उनकी बातचीत!
करीब
चालीस साल की औरत. उसीने प्रेसिडेन्ट के काफ़िले को रोका था. आप यकीन नहीं करेंगे, वह
लाइब्रेरियों की हालत के बारे में कह रही थी.
उसने कहा
: हमारे यहाँ लाइब्रेरियों के सामने काफ़ी समस्याएँ हैं, मैं
ख़ुद रूसी भाषा और साहित्य की शिक्षिका हूँ, और अच्छी तरह
जानती हूँ, कि हालात क्या हैं, बरीस
निकलाएविच. और, बरीस निकलाएविच, लाइब्रेरियन्स
और शिक्षकों की, और साथ ही पोलिक्लिनिक्स के डॉक्टर्स की
तनख़्वाह बेहद कम है.
और उसने
जवाब दिया : ये सही नहीं है, इसे देखना होगा.
और
सहयोगी ने उससे कहा : ज़रूर देखेंगे, बरीस निकलाएविच.
और मैं
सोच रहा था : मेरी पिस्तौल कहाँ है?
मेरे पास
पिस्तौल नहीं थी!
और अचानक
उस औरत ने उसे अपने बारे में बताया : मेरा नाम गलीना अलेक्सान्द्र्व्ना है, मैं
माक्लिन स्ट्रीट पर बिल्डिंग नंबर 9/11 में रहती हूँ, जवान
बेटे के साथ, एक कमरे में...बिल्डिंग की हालत बेहद ख़स्ता है,
हमारा क्वार्टर सामुदायिक है...
और वह
उससे बोला : आपको नया क्वार्टर देंगे.
और सहायक
ने औरत से कहा : हर समस्या सुलझा लेंगे.
और यह सब
बगल में – मेरे सामने! मगर मैं पिस्तौल नहीं ले गया था!
दूसरे
लोग भी पूछने लगे,
मगर अस्पष्ट-सा, उलझा-सा. उनके प्रति उसने
दिलचस्पी नहीं दिखाई.
मैं भी
चाहता था : बरीस निकलाएविच, क्या आप, वाकई
में, आज बैले (...या ऑपेरा? ) देखने
नहीं जाएँगे? (मैंने अभी तक उम्मीद नहीं छोड़ी थी). मगर तभी
एक चौड़ी पीठ ने प्रेसिडेन्ट को मुझसे छुपा दिया.
और अगर
पूछता भी – तो वे कहते “ हेल विथ यू!”
वैसे, जाँचकर्ता
इतना भला था, कि उसने बाद में मुझे अख़बार दिखाया : बरीस
निकलाएविच, शायद, उस दिन पूश्किन के
स्मारक पर फूल चढ़ा रहा था.
वह धम्
से कार में बैठ गया. और सारे सहायक और चमचे अपने अपने वाहनों की ओर भागे. और पूरा
काफ़िला धीरे-धीरे आगे बढ़ा और मॉस्को एवेन्यू से फ़न्तान्का की ओर मुड़ गया.
शिक्षिका
खड़ी थी और उन्हें जाते हुए देख रही थी. प्रेसिडेन्ट की टीम के संवाददाताओं ने उसे
घेर लिया. पुलिस-लेफ्टिनेंट कर्नल ने हमें आने-जाने का रास्ता छोड़ने के लिए कहा.
जल्दी ही
मॉस्को एवेन्यू पर फिर से आवागमन शुरू हो गया.
और मैं
जागा.
मैं घर
की चप्पलें पहने ट्रैफ़िक सिग्नल के नीचे खड़ा था और समझ रहा था कि किस्मत मुझे ऐसा
मौका दुबारा नहीं देगी. मैंने बाथरूम का दरवाज़ा क्यों नहीं तोड़ा? मगर,
क्या मैं सोच सकता था कि वह बख़्तरबन्द गाड़ी से बाहर आ सकता है?
आ सकता
था! आ सकता था! आ सकता था! मुझे इस बात को भाँप लेना चाहिए था!
मैंने
स्वयम् को प्रेसिडेन्ट पर गोली चलाते हुए देखा. मैंने देखा गिरते हुए – उसको.
मैंने आने-जाने वालों के अचरज भरे चेहरे देखे, जो विश्वास ही नहीं कर सकते
थे, कि तानाशाह से मुक्ति मिल गई है.
मैं अपने
आप को बचा भी सकता था. मुझे वो काम नहीं दिया गया था. मगर मैं पिस्तौल फेंक कर प्रवेश
द्वार में भाग सकता था.
मैंने बस
देखा,
कि मैं कैसे बिल्डिंग नं. 18 के प्रवेश द्वार के भीतर भागते हुए
आँगन पार कर रहा हूँ. वे, जो, अचानक
चौंक कर मेरे पीछे भाग रहे हैं, सोच रहे हैं, कि मैं बेवकूफ़ हूँ – क्योंकि सामने अंधी गली है... ये मैं बेवकूफ़ हूँ?
बल्कि आप सब बेवकूफ़ हैं! और बाईं ओर वाले गलियारे का क्या? वहाँ खाली दीवार और पाँच मंज़िला इमारत के कोने के बीच एक चौड़ी झिरी है. ये,
मैं चिनार की बगल से भागता हूँ, जिसे तब तक
नहीं काटा गया था, और बाईं ओर को लपकता हूँ, और मैं आ गया हूँ आयताकार आँगन
में, जिसमें भूतपूर्व लॉण्ड्री के दरवाज़े को छोड़कर एक भी
प्रवेश द्वार नहीं है…तो? क्या?
यहाँ से दो रास्ते हैं – 110, फ़न्तान्का के
आँगन को, या 108, फ़न्तान्का के आँगन को,
पुराने टॉयलेट के कॉन्क्रीट के खण्डहर की बगल से. बेहतर है – 108
में. फ़न्तान्का में कोई भी मेरा इंतज़ार नहीं कर रहा है!...सीढ़ियों पर लपकते हुए छत
पर जा सकता हूँ, और यहाँ छतों से होकर भागने में कितना मज़ा
आता है!...छतों पर भागना बेहद आसान है, ठेठ टेक्नोलॉजी
इन्स्टीट्यूट की छत तक!...या फिर ईंटों वाली नीची, खाली
दीवार पर चढ़कर मिलिट्री हॉस्पिटल वाली बिल्डिंग की ढलवाँ छत पर पहुँचना भी संभव
है... हॉस्पिटल के गार्डन से मैं व्वेदेन्स्की कॅनाल के प्रवेशद्वार मार्ग तक
पहुँच जाऊँगा...और जाली फ़ाँदकर – ज़ागरद्नी पर, ब्लॉक के
दूसरी ओर!
मैं
आसानी से भाग सकता था!
और रुक
भी सकता था. आत्म समर्पण कर सकता था. मैं कहता : रूस, तू
बच गया!”
“ओह, वे
मेरा स्मारक भी खड़ा करते! सीधे यहीं, तमारा की बिल्डिंग के
सामने वाले गार्डन में! संगमरमर के मील के पत्थर की ठीक बगल में, जिस पर खुदा है, अठारहवीं शताब्दी, शिल्पकार रिनाल्दी!
मगर, मुझे
बस, स्मारक नहीं चाहिए! और तमारा की बिल्डिंग पर स्मृति-फ़लक
की तो बिल्कुल भी ज़रूरत नहीं है!
आपको
मालूम नहीं है कि मैं तमारा से कितना प्यार करता था!
आप
कल्पना भी नहीं कर सकते, कि मैं बरीस निकलायेविच से कितनी नफ़रत करता था!
और ये
मौका हाथ से निकल गया. मैं शहर में भटकता रहा. मैं सिन्नाया तक गया, फिर
गरोखवाया तक. लकड़ी के बने गर्स्त्कीन ब्रिज को पार करके मैं फ़न्तान्का के गंदे
पानी में डूब जाना चाहता था. पानी से लकड़ी के टेके बाहर निकल रहे थे (बसन्त वाली
बर्फ के सामने), मैंने उनकी ओर देखा और समझ नहीं पाया कि
जिऊँगा कैसे.
बेहतर
होता कि तभी डूब जाता! ज़्यादा बेहतर होता...
मुझे याद
नहीं,
कि मैं और कहाँ गया था, मुझे याद नहीं है कि
मैं किस बारे में सोच रहा था. मुझे ये भी याद नहीं है कि ज़ागरद्नी वाले ‘बार’ में गया था कि नहीं. परीक्षणों ने सिद्ध किया
कि मैं होशो-हवास में था. मगर मुझे लग रहा था कि मैं अपने-आप में नहीं हूँ.
मगर एक
बात मैं निश्चित रूप से जानता हूँ, मैं जानता था, कि अपने आप को कभी माफ़ नहीं करूँगा.
इस शहर
में जून में रातें श्वेत होती हैं, मगर मुझे महसूस हुआ कि अँधेरा हो
रहा है, या फिर, हो सकता है, कि मेरी आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा था. याद है, कि घर आया था. याद है. तमारा टेलिविजन देख रही थी. मैं नहीं चाहता था,
कि तमारा गोली की आवाज़ सुने. मैं पिछले कम्पाऊण्ड में अपने आप को
गोली मार लेना चाहता था. बाथरूम में आया, पिस्तौल निकाला,
उसमें गोलियाँ भरीं. पतलून के बेल्ट के पीछे उसे छुपा लिया. आईने में
ख़ुद को देखा.
डरावना
थोबड़ा. मगर गोली मार लूँ, तो और भी भयानक हो जाएगा.
मैंने
फ़ैसला किया कि उससे बिदा नहीं लूँगा. बिदा लेने के पल मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता
था. बाहर जाने के इरादे से मैं दरवाज़े की ओर लपका. और तभी वह किचन से आई, जहाँ
टी.वी. देख रही थी, और मुझसे कहा.
उसने
मुझसे कहा.
उसने
मुझसे कहा : तुम कहाँ थे?...तुमने सब छोड़ दिया?...तुम कुछ भी नहीं जानते?...सिर्फ कल्पना करो, सारे समाचारों में दिखा रहे थे, आज ठीक हमारी
खिड़कियों के सामने ऐसी घटना हुई! टीचर ने बरीस निकलायेविच की गाड़ी को रोक दिया! वह
एक कमरे वाले क्वार्टर में रहती है अपने जवान बेटे के साथ और उसने उन्हें नया
क्वार्टर देने का वादा किया!
मैं जम
गया.
आप सब
लोग बरीस निकलायेविच को गालियाँ देते हो, तमारा
ने कहा, और उसने क्वार्टर देने का वादा किया.
बेवकूफ़!
बेवकूफ़! बेवकूफ़!
मैं
चीख़ा.
और एक
साथ पाँच गोलियाँ उस पर दाग दीं.
मैंने
अपने इरादे को नहीं छुपाया और पहली ही पूछताछ में बता कर दिया, कि
बरीस निकलायेविच को मारना चाहता था.
मुझे
कहीं ले गए. उच्च अधिकारियों ने मुझसे पूछताछ की. मैंने पिस्तौल के बारे में बताया, बाथरूम
के पाइप के बारे में बताया. सारे नाम बताए, क्योंकि वे सोच
रहे थे, कि मैंने अपनी साथी को मार डाला है. गोशा, आर्थर, ग्रिगोरिन, उलीदव,
कोई “वान्यूशा”, कुरापात्किन, कोई सात और भी...और कैप वाला लेखक.
सिर्फ
एमिल्यानिच का नाम मैंने नहीं लिया. और उस संगठन का भी, जो
उसके पीछे था.
पहले तो
उन्हें विश्वास नहीं हुआ, कि मैं अविवाहित हूँ, और बाद में किसी भी बात पर विश्वास नहीं किया.
अजीब बात
है. विश्वास कर भी सकते थे. उस समय एक के बाद हो रही कोशिशों का पर्दाफ़ाश हो रहा
था. सुरक्षा-सेवा इस बारे में सूचित कर रही थी. मुझ से भी पहले, मुझे
याद है, कॉकेशस के एक गिरोह
का पर्दाफ़ाश किया गया था, मॉस्को पहुँचने से पहले ही
उन्हें सोची स्टेशन पर ट्रेन से उतार लिया गया. एक संभावित हत्यारा मॉस्को की
किन्हीं अटारियों में छुपा हुआ था, उसके पास चाकू था,
- पूछताछ के दौरान उसने स्वीकारोक्ति दी, उसका
क्या हुआ, मुझे नहीं पता. अख़बारों में लिखा था, रेडिओ पर सूचित किया जाता था.
मगर मेरे
बारे में – किसी ने भी नहीं, कुछ भी नहीं.
शिक्षिका
गलीना अलेक्सान्द्रव्ना के बारे में, जो माक्लिन एवेन्यू पर रहती थी और
जिसने बरीस निकलायेविच की गाड़ी रोकी थी,
सबने सुना. मगर मेरे बारे में – किसी ने भी नहीं, कुछ भी नहीं.
मुझे अभी
भी पता नहीं है कि एमिल्यानविच ने किस अफ्रीकन देश में अन्तरराष्ट्रीय कर्तव्य
पूरा किया.
चिकित्सा
विज्ञान का डॉक्टर, प्रोफ़ेसर गे. या. मख्नाती मेरा सम्मान करता था,
वह मुझसे भलमनसाहत से पेश आता था. ये आसान नहीं था, मैं बहुत सारी बातों के बारे में सोचता था.
मुझे
सलाह दी गई कि इन वर्षों को भूल जाऊँ.
मैं
व्सेवलोझ्का में रहता हूँ, अपने अपंग बाप के साथ, जिसकी दूसरी बीबी की मृत्यु हो चुकी है. मेरा बाप है. वह अपंग है.
कभी-कभी
हम ‘स्क्रैबल’, जिसे हम –“एरुडाइट” कहते हैं - खेलते हैं. मेरा बाप
करीब-करीब नहीं चलता, मगर उसकी याददाश्त मुझसे बुरी नहीं है.
सेंट
पीटर्सबुर्ग में मैं काफ़ी अर्से बाद आया हूँ. मुझसे कहा गया है कि यहाँ न
आऊँ.
मुझे
अफ़सोस होता है,
कि ऐसा हो गया. मैं उसे मारना नहीं चाहता था. मेरा गुनाह बहुत बड़ा
है.
मगर मैं
किसे और कैसे समझाऊँ, कि असल में मैं तमारा से कितना प्यार करता था!?
जिसने कभी किसी से प्यार किया हो, वही समझ
सकता है. उसके पास बहुत सारे अच्छे गुण थे. मैं नहीं चाहता था. और वह भी नहीं. उसे
नहीं करना चाहिए था. किसलिए? इतने सारे अच्छे गुण होते हुए
भी ऐसी बात कहना! इतना भी परले सिरे का बेवकूफ़ नहीं होना चाहिए. कभी नहीं! बेवकूफ़.
ऐसी बात कहना! नहीं, बस, बेवकूफ़!
बेवकूफ़, बेवकूफ़, तुझसे ही कह रहा हूँ!
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