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शुक्रवार, 27 मार्च 2026

माँ क्या कहती?

  

माँ क्या कहती?

ल्यूबोव वरान्कोवा  

 

अनुवाद

आ. चारुमति रामदास

 

 

ग्रीन्का और फेद्या सोरेल (खट्टी घास) चुनने के लिए घास के मैदान में जाने के लिए तैयार हो रहे थे. वान्या भी उनके साथ हो लिया.

“जा, जा,” दादी ने कहा, “सोरेल लाएगा, हरी गोभी का सूप बनायेंगे.”

मज़ा आ रहा था घास के मैदान में. घास अभी नहीं काटी गयी थी. चारों तरफ – दूर दूर तक फूल चमक रहे थे – लाल भी, नीले भी, सफ़ेद भी. पूरा मैदान फूलों से भरा था.    

लडके घास के मैदान में बिखर गए और सोरेल तोड़ने लगे. ऊंची ऊंची घास में, प्यारे-प्यारे फूलों में, वे आगे-आगे बढ़ते गए.

अचानक फेद्या ने कहा:

“यहाँ बहुत सारी मधुमक्खियाँ हैं!”

“सच्ची, यहाँ बहुत मधुमक्खियाँ हैं,” वान्या ने भी कहा. “पूरे समय भिनभिना रही हैं.”

“ऐ, लड़कों,” ग्रीन्का दूर से चिल्लाया, “पीछे मुड़ो ! हम मधुमक्खियों के बगीचे में पहुँच गए हैं – ये रहे मधुमक्खियों के छत्ते!”

सामूहिक फ़ार्म के छत्तों को लिंडन और अकासिया के घने पेड़ों ने चारों तरफ़ से घेरा हुआ था. और टहनियों के बीच से मधुमक्खियों के छोटे छोटे घर दिखाई दे रहे थे.

“लड़कों, पीछे हटो!” ग्रीन्का ने हुक्म दिया. “मगर धीरे से, हाथ न हिलाना, वर्ना मधुमक्खियाँ काटेंगी.”

लड़के सावधानी से छत्ते से दूर हटे. वे खामोशी से चल रहे थे और हाथ नहीं हिला रहे थे, ताकि मधुमक्खियों को गुस्सा न दिलाएं. और वे करीब-करीब मधुमक्खियों से दूर हट गए थे, मगर तभी वान्या ने सुना कि कोई रो रहा है. उसने अपने साथियों की ओर देखा, मगर न तो फेद्या रो रहा था, ना ही ग्रीन्का, बल्कि मधुमक्खी पालक का बेटा, छोटा वासित्का रो रहा था. वह मधुमक्खियों के बगीचे में चला गया था और छत्तों के बीच खडा था, और मधुमक्खियाँ उस पर झपट पड़ी थीं.

“दोस्तों!” वान्या चीखा. “वास्याता को मधुमक्खियों ने काटा!”

“तो, क्या हमें उसके पीछे मधुमक्खियों के छत्ते में जाना चाहिए?” ग्रीन्का ने पूछा, “मधुमक्खियाँ हमें भी काटेंगी.”

“उसके पापा को बुलाना चाहिए,” फेद्या ने कहा. “उनके घर के सामने से चलते हैं, उसके पापा को बता देंगे.”

और दोनों आगे चले. मगर वान्या वापस लौटा और सीधे छत्ते की ओर चला.

“यहाँ आ!” उसने चिल्लाकर वास्यात्का से कहा.

मगर वास्यात्का ने सुना नहीं. वह हाथों से मधुमक्खियों को दूर भगा रहा था, और गला फाड़कर चीख रहा था.

वान्या वास्यात्का के पास गया, उसका हाथ पकड़ा और उसे छत्ते से दूर ले आया.

वास्यात्का की माँ भाग कर पोर्च में आई, उसने वास्यात्का का हाथ पकड़ा:

“आह, तू ज़िद्दी बच्चा, छत्ते के पास क्यों गया? देख, कैसे मधुमक्खियों ने काटा है!” उसने वान्या की ओर देखा. “आह, प्यारे, वानेक,” उसने कहा, “तुझे भी वास्यात्का की वजह से मक्खियों से तोहफा मिला है! खैर, कोई  बात नहीं, तुम घबराना नहीं: थोड़ा सा दर्द होगा – ख़त्म हो जाएगा!

“मुझे कुछ नहीं हुआ है,” वान्या ने कहा.

और घर चला गया. घर पहुंचते-पहुंचते उसका होंठ सूज गया, और पलक सूज गयी, और आंख बंद हो गयी.

“वाह, क्या बात है!” दादी ने कहा, “ये किसने तुझे सजाया है?

“मधुमक्खियों ने,” वान्या ने जवाब दिया.

“तो ग्रीन्का और फेद्या को मधुमक्खियों ने क्यों नहीं छुआ?

“वे भाग गए, और मैं वास्यात्का को साथ में लाया,” वान्या ने कहा. “और ऐसी भी क्या बात है? थोड़ा सा दर्द होगा – रुक जाएगा.”

पिता खेत से खाना खाने के लिए आये, वान्या की तरफ देखा और हंसने लगे.

“फेद्या और ग्रीन्का मधुमक्खियों से दूर भाग गए,” दादी ने कहा. “और हमारा भोलूराम वास्यात्का को बचाने के लिए भागा. अगर अभी माँ इसे देखती – तो वह क्या कहती?

वान्या ने एक आंख से पिता की ओर देखा और इंतज़ार करने लगा: ‘माँ क्या कहती?

मगर पिता मुस्कुराए, उन्होंने वान्या का कंधा थपथपाया :

“वो कहती : बहादुर है मेरा बेटा!” वह ऐसा ही कहती!

मंगलवार, 24 मार्च 2026

परीक्षा

  

परीक्षा


नादेझ्दा तेफ़ी

 

अनुवाद

आ. चारुमति रामदास


भूगोल की परीक्षा की तैयारी के लिए तीन दिन दिए गए थे. जिनमें से दो मानिच्का ने अपनी टेब्लेट के साथ नए बेल्ट की नाप लेने में व्यर्थ गँवा दिए. तीसरे दिन शाम को पढ़ने के लिए बैठी. किताब खोली, नक्शा खोला और – फ़ौरन समझ गई कि वह बिल्कुल कुछ भी नहीं जानती है. न तो नदियाँ, न पहाड़, न ही शहर, न समुद्र, न खाड़ी – बिल्कुल कुछ भी नहीं. और वे बहुत सारे थे – हर चीज़ किसी न किसी बात के लिए मशहूर थी. हिन्द महासागर टाइफ़ून्स के लिए, व्याज़्मा – जिंजर ब्रेड के लिए, पम्पासी – जंगलों के लिए, ल्यानोसी – स्तेपियों के लिए, वेनिस – नहरों के लिए, चीन – पूर्वजों के प्रति आदर के लिए. सब कुछ मशहूर था! अच्छी प्रसिद्धि घर के भीतर ही रहती है, और बदनामी दुनिया भर में भागती फ़िरती है – और पिन्स्क की दलदल भी बुखार के लिए मशहूर है. ये नाम तो मानिच्का रट भी लेती, मगर प्रसिद्धि के बारे में याद नहीं रख पायेगी. “खुदा, अपनी गुलाम मारिया को भूगोल का इम्तिहान पास करने में मदद कर! और उसने नक़्शे के मार्जिन पर लिखा: ‘खुदा, मदद कर! खुदा मदद कर! खुदा मदद कर!’ तीन बार. फिर उसने सोचा : बारह बार लिखती हूँ, “खुदा मदद कर”, तब इम्तिहान पास कर लूंगी. बारह बार लिखा, मगर आख़िरी लब्ज़ लिखते हुए, उसने खुद ही सोचा: “अहा! खुश हूँ कि पूरा लिख लिया. नहीं, मान! अगर इम्तिहान पास करना है, तो और बारह बार लिख, बल्कि बेहतर होगा पूरे बीस बार. उसने नोट बुक ली, क्योंकि नक़्शे की मार्जिन पर जगह बहुत कम थी, और लिखने बैठ गयी. लिखती और बोलती जाती: “सोच, क्या बीस बार लिखने से इम्तिहान पास कर लोगी? नहीं, प्यारी, पचास बार लिखो! हो सकता है, तभी कुछ बात बने. पचास बार? खुश हो गई कि जल्दी ही पूरा हो जाएगा! आँ? सौ बार, ज़रा भी कम नहीं...कलम थरथरा रही है, और धब्बे गिरा रही है. मानिच्का ने चाय और डिनर से इनकार कर दिया. उसके पास फ़ुर्सत ही नहीं है. जल्दी जल्दी और तनाव में काम करने से उसके गाल जल रहे हैं, वह पूरी थरथरा रही है. रात के तीन बजे दो नोट बुक्स और एक पैड पूरा लिख देने के बाद मेज़ पर ही उसकी आंख लग गई.

 

*****

 

सुन्न और उनींदी, उसने कक्षा में प्रवेश किया. सब लोग आ चुके थे और अपनी उत्तेजना एक दूसरे के साथ बांट रहे थे. – ‘मेरा दिल हर मिनट आधे घंटे के लिए रुक जाता है!” पहली छात्रा ने आंखें गोल-गोल घुमाते हुए कहा.

मेज़ पर परिक्षा के टिकट रखे थे. अत्यंत अनुभवहीन आंख भी उन्हें फ़ौरन चार श्रेणियों में बांट सकती थी : टिकट जो गोल गोल पाईप की भांति मुड़े हुए थे, नाव जैसे, ऊपर उठे हुए कोनों वाले, और नीचे झुके कोनों वाले. मगर संदेहास्पद व्यक्तियों, पिछली बेंचों वालों को, जिन्होंने ये चालाक तरीका बनाया था, यह प्रतीत हुआ, की अभी भी ये सब पर्याप्त नहीँ है, और वे मेज़ के इर्द गिर्द घूम रहे थे, टिकट्स को ठीक करते हुए, जिससे ज़्यादा स्पष्ट दिखाई दे,

-    “मान्या कूक्सिना!” वे चिल्लाए. “तूने कौन से टिकट मुँहजुबानी याद किये हैं? आं? देख, ये सब कैसे होता है! नाव जैसे – पहले पांच टिकट्स हैं, और पाईप जैसे – अगले पांच, और कोनों वाले...” मगर मानिच्का ने पूरी बात नहीं सुनी.  उसने उदासी से सोचा, कि ये सब पढ़ने-लिखने की बातें उसके लिए नहीं बनीं हैं, जिसने एक भी टिकट मुंह जुबानी याद नहीं किया है,” – और उसने गर्व से कहा: “इस तरह दादागिरी करना शर्म की बात है! पढ़ाई अपने लिए करना होती है, न कि नंबर लाने के लिए.”

टीचर आये, बैठ गए, उदासीनता से सारे टिकट्स इकट्ठा किये और, उन्हें करीने से रखकर आपस में मिला दिया. क्लास में हल्की सी कराह गूंजी. परेशान हो गए और ऐसे झूलने लगे, जैसे हवा में रई का पौधा डोलता है. “मैडम कुक्सिना! प्लीज़ यहाँ आईये. मानिच्का ने टिकट उठाया और पढ़ा: “जर्मनी की जलवायु. अमेरिका की प्रकृति. उत्तरी अमेरिका के शहर”...   

“हाँ, मैडम कुक्सिना. आप जर्मनी की जलवायु के बारे में क्या जानती हैं?

मानिच्का ने उसकी तरफ़ ऐसी नज़र से देखा, जैसे कहना चाहती हो, “जानवरों को क्यों सता रहे हो?” – और गहरी सांस लेकर बुदबुदाई: “जर्मनी की जलवायु इस बात के लिए प्रसिद्ध है, कि वहां उत्तर और दक्षिण की जलवायु में ख़ास फ़रक नहीं है, क्योंकि जर्मनी जितना उत्तर की ओर है, उतना ही दक्षिण की तरफ़ भी है...”

टीचर ने भौंह चढ़ाई और मानिच्का के मुंह की तरफ़ देखा. – “तो-,” उसने कुछ देर सोचा और कहा, “आप जर्मनी की जलवायु के बारे में कुछ भी नहीं जानती, मैडम कुक्सिना. बताइये, आप अमेरिका की प्रकृति के बारे में क्या जानती हैं?

मानिच्का ने, अपने ज्ञान के प्रति शिक्षक के अन्यायपूर्ण रवैये से उदास होकर सिर झुकाया और संक्षेप में जवाब दिया: “अमेरिका पम्पास के लिए प्रसिद्ध है.”

शिक्षक खामोश रहा, और मानेच्का ने एक मिनट इंतज़ार करने के बाद आगे कुछ ऊंची आवाज़ में जोड़ा: “और पम्पास, - लानोस के लिए.”

शिक्षक ने ज़ोर से गहरी सांस ली, जैसे जाग गया हो, और भावपूर्ण आवाज़ में बोला:

“बैठ जाईये, मैडम कुक्सिना.”

*****

अगली परीक्षा इतिहास की थी. शांत महिला ने कठोरता से चेतावनी दी: “देखों कुक्सिना! दो-दो पुनः परीक्षाएं तो तुम्हें देने से रहे, इतिहास की तैयारी ठीक तरह से करो, वरना दूसरा साल भी यहीं रुक जाओगी. कैसी शर्म की बात है! अगले पूरे दिन मानेच्का दबाव में रही. दिल बहलाने के लिए आईस्क्रीम वाले से पिस्ते के दस डिब्बे खरीद लिये, और शाम को अपनी इच्छा के विरुद्ध कैस्टर ऑइल पी लिया. मगर अगले दिन, - परिक्षा शुरू होने से एक दिन पूर्व, मार्लिट की दूसरी पत्नी पढ़ते हुए दीवान पर लेटी रही, ताकि दिमाग़ को कुछ आराम दे सके, जो ‘भूगोल’ के कारण बेहद थक गया था. शाम को इलावायस्की को लेकर बैठी डरते-डरते लगातार दस बार लिख डाला: “खुदा, मेहेरबानी...” कड़वाहट से मुस्कुराई और बोली: “दस बार! जैसे खुदा को दस ही बार कहने की ज़रुरत है! डेढ़ सौ बार लिखती तो बात कुछ और होती! सुबह छह बजे बगल वाले कमरे से आंटी ने सुना, कि मानिच्का कैसे अपने आप से दो आवाजों में बात कर रही है. एक आवाज़ कराह रही थी: “अब और ज़्यादा नहीं कर सकती! ओह, नहीं कर सकती! दूसरी आवाज़ ने व्यंग्य से कहा: “आहा! नहीं कर सकती! एक हज़ार छः सौ बार नहीं लिख सकती, ‘खुदा, मेहेरबानी ...’, मगर परिक्षा तो पास करना चाहती हो! तो, लो! इसकी सज़ा ये है, कि दो सौ हज़ार बार लिखो! कोई बात नहीं! कोई बात नहीं! भयभीत आंटी ने मानिच्का को सोने के लिए भेजा. ‘ऐसा नहीं करते. रटाई भी एक हद के भीतर होनी चाहिए. थकान से चूर हो जाओगी, तो कोई भी जवाब न दे पाओगी.

क्लास में वही पुराना दृश्य था, भयभीत फुसफुसाहट और परेशानी, और पहली विद्यार्थिनी का दिल, जो हर मिनट तीन घंटों के लिए रुक जाता था, और परिक्षा के टिकट, जो चार पैरों पर घूम रहे थे, और उदासीनता से उन्हें फेंटता हुआ टीचर. 

मानिच्का बैठी है और, अपनी किस्मत के फैसले का इंतज़ार करते हुए पुरानी नोटबुक के कवर पर लिखती है: 

‘खुदा मेहेरबानी कर. सिर्फ छः सौ बार लिख ले तो वह बढ़िया अंकों से पास हो जायेगी!’

“मैडम, कुक्सिना मारिया!”

नहीं, नहीं लिख पाई! टीचर गुस्से में है, व्यंग्य करता है,  सभी से  प्रश्न-टिकट के अनुसार नहीं, बल्कि कहीं से भी, कुछ भी पूछ लेता है.

“आन्ना इयोनव्ना के युद्धों के बारे में और उनके परिणामों के बारे में आप क्या जानती हैं, मैडम कुक्सिना?”

मानिच्का के थके हुए दिमाग़ में कोई चीज़ रेंग गयी: “आन्ना इयोनव्ना का जीवन भरा हुआ था...आन्ना इयोनव्ना भरी हुई थी...आन्ना इयोनव्ना के युद्ध भरे हुए थे....वह थोड़ा रुकी, गहरी सांस ली, और आगे बोली, मानो आखिरकार सही चीज़ कह रही हो: “आन्ना इयोनव्ना के परिणाम भरे हुए थे...और खामोश हो गई .

टीचर ने हथेली में अपनी दाढी लेकर नाक पर दबाई. मानिच्का पूरे मन से इस हरकत को देख रही थी, और उसकी आंखें कह रही थीं : ‘जानवरों को क्यों तंग करते हो?

“क्या आप अब बतायेंगी, मैडम कुक्सिना,” टीचर ने हौले से पूछा, “ओरलियन्स की कन्या को ‘ओर्लियान्साकाया’ क्यों कहते थे?

मानिच्का ने महसूस किया कि ये अंतिम प्रश्न है, जिसके परिणाम भयानक, सबसे ‘भयानक परिणाम’ होंगे. सही जवाब के साथ होंगे : साइकिल, जिसका वादा आंटी ने अगली कक्षा में जाने पर किया था, और लीजा बेकिना के साथ चिरंतन दोस्ती, जिससे, फ़ेल होने पर जुदा होना पडेगा. लीज़ा ने तो परिक्षा पास कर ली थी, और आराम से अगली कक्षा में चली जायेगी.

“तो?” शिक्षक जल्दी कर रहे थे, ज़ाहिर है, वह मानिच्का का जवाब सुनने के लिए उतावले हो रहे थे.

“उसे ओर्लियान्स्काया क्यों कहते थे?

मानिच्का ने मन ही मन वादा किया की फिर कभी मीठा नहीं खायेगी और असभ्यता से बर्ताव नहीं करेगी.  

उसने ‘आइकन’ की तरफ़ देखा, गला साफ़ किया, और शिक्षक की आंखों में सीधे देखते हुए दृढ़ता से जवाब दिया : “क्योंकि वह ‘लड़की’ थी.”   

 

**********

शनिवार, 14 मार्च 2026

अपने और पराये

 

अपने और पराये

 

नादेझ्दा तेफ़ी

 

अनुवाद

आ. चारुमति रामदास

 

अपने सन्दर्भ में सभी व्यक्तियों को हम “अपने” और “पराए” में विभाजित करते हैं.

अपने – ये वो होते हैं, जिनके बारे में  हम, शायद, जानते हैं, कि उनकी उम्र कितनी है और उनके पास कितने पैसे हैं.  परायों की उम्र और उनकी संपत्ति हमसे हमेशा और पूरी तरह छिपी रहती है, और यदि किसी कारण से यह भेद हम पर खुल जाता है, तो ‘पराये’ पल भर में अपने बन जाते हैं, और यह अंतिम बात हमारे लिए बेहद अटपटी है, और इसीलिये ‘अपने' सच्चाई को हमारी आँखों में चुभोने को अपना कर्तव्य मानते हैं, जबकि ‘पराये’ नज़ाकत से झूठ बोल देते हैं. किसी व्यक्ति के जितने ज़्यादा ‘अपने’ होते हैं, उतनी ही ज़्यादा अपने बारे में कड़वी सच्चाई को वह जानता है, और उतना ही उसके लिए दुनिया में जीना मुश्किल हो जाता है.  

मिसाल के तौर पर, आप रास्ते में किसी पराये आदमी से मिलते हैं. वह प्यार से मुस्कुराएगा और कहेगा: “आज आप कितनी ताज़ा तरीन लग रही हैं!” और तीन मिनट बाद (इतने समय में आपमें भला क्या बदल सकता है?) ‘अपना' आता है, वह आपको संदेह भरी नज़र से देखेगा और कहेगा: “डियर, ये तुम्हारी नाक कुछ सूजी हुई है. क्या ज़ुकाम है?” अगर आप बीमार हैं, तो ‘परायों'[i] से आपको सिर्फ खुशी और प्रसन्नता मिलती है: सहानुभूति के पत्र, फूल, मिठाईयां. ‘अपना’ – सबसे पहले यह बात जानना अपना कर्तव्य समझता है, कि आपको कहाँ और कब ज़ुकाम लगा होगा, जैसे यही सबसे महत्वपूर्ण बात है. जब, आखिरकार, उसकी राय में स्थान और समय निश्वित हो जाता है, तो वह आपको डांटने लगेगा, कि आपको ज़ुकाम क्यों हो गया, वहीं, फ़ौरन – “आख़िर बिना गलोशों (रबर के ऊपरी जूते – अनु.) के माशा आंटी के यहाँ कैसे चले गए! ये तो सीधे-सीधे गुस्सा दिलाने वाली बात है - इतनी लापरवाही - आपकी उम्र में! इसके अलावा, पराये हमेशा ऐसा दिखाते हैं, कि आपकी बीमारी से बहुत डर गए हैं और उसे बेहद गंभीरता से ले रहे हैं. 

“माय गॉड, आप तो, शायद खांस रहे हैं! ये खतरनाक बात है! आपको शायद निमोनिया है! खुदा के लिए, डॉक्टरों की परामर्श समिति को बुलाईये. इसे हलके में मत लीजिये.”

मैं शायद परेशानी से पूरी रात न सो पाऊँ. ये सब आपके लिए अच्छा है, इसके अलावा, मरीज़ को भी हमेशा अच्छा ही लगता है, जब उसके बकवास इन्फ़्लुएन्ज़ा को, जब तापमान 37.1 डिग्री हो, बढ़ा चढ़ाकर न्यूमोनिया कहां जाता है. ‘अपनों’ का बर्ताव एकदम अलग होता है.

“बताईये, प्लीज़! ये तो बिस्तर पर लुढ़क गया! ओह, ऐसी बेवकूफी से क्या शर्म नहीं आयेगी! अपमानजनक संदेह...खैर, अपने आप को संभालो – ऐसी कमज़ोरी अच्छी नहीं है! – अच्छा मज़ाक है, जब मेरा तापमान अड़तीस डिग्री है” – पूरी एक डिग्री बढ़ाकर आप चीखते हो.

“बहुत अच्छी बात है!” अपना वाला मज़ाक उडाता है. “लोग टाइफ़ाइड को पैरों पर साथ लिए फिरते हैं, और ये अड़तीस डिग्री पर मरने चला है. खतरनाक! और वह बड़ी देर तक आपको चिढ़ाता रहेगा, कई दिलचस्प किस्से सुनाते हुए, जब आप इसी तरह आंखें घुमाते थे और कराहते थे, और दो घंटे बाद भुनी हुई टर्की खा रहे थे. ये किस्से आपको गुस्से से बेकाबू कर देते हैं, आपका बुखार उस डिग्री तक बढ़ा देते हैं, जहां तक आप उसे झूठमूठ ले गए थे. ‘अपनों' की भाषा में इसे कहते हैं ‘रिश्तेदार मरीज़ की हिम्मत बढ़ाना’.

“अपनों' को जानना बहुत दुखदायी और चिडचिडाहटभरा होता है. ‘पराये' हंस कर आपका स्वागत करते हैं, ऐसा दिखाते हैं कि आपके आने से उन्हें बेहद खुशी हुई है. क्योंकि उनकी उम्र के बारे आपको नहीं जानना चाहिए, इसलिए उन सबके चेहरे पाउडर से पुते हुए और जवान नज़र आते हैं, बातचीत प्रसन्न, गतिविधियाँ जिंदादिल और आत्मविश्वास से भरपूर. और चूंकि आपको नहीं जानना चाहिए कि उनके पास कितना पैसा है, तो आपको धोखे में रखने के लिए स्वादिष्ट और महंगे पदार्थीं से आपका स्वागत करेंगे. इसी कारण से आपको सबसे बढ़िया कमरे में बिठाएँगे, जिसमें बेहद ख़ूबसूरत फर्नीचर होगा, जितना संभव होगा, और फटे हुए परदों वाले बेडरूम्स और वाशबेसिन के बदले स्टूल दिखाएँगे भी नहीं, चाहे आप कितना ही क्यों न पूछो. आपके लिए नए कप्स रखेंगे, और केतली भी टूटी हुई टोंटी वाली नहीं, नैपकिन देंगे साफ़ सुथरा, और बातचीत ऐसी होगी, जो आपको प्यारी लगे – आपकी किसी योग्यता के बारे में, और अगर आपमें वह नहीं है, तो आपकी नई हैट के बारे में, और अगर वह भी न हो तो, आपके अच्छे स्वभाव के बारे में. “अपनों” में आपको ऐसी कोई बात न मिलेगी , क्योकि आपकी पूरी उम्र के बारे में वे जानते हैं, इसलिए अलसाए हुए, और नाक चढ़ाए पेश आते हैं. “ए-एख, बुढापा खुशगवार नहीं होता. तीसरे दिन सिर दर्द करने लगता है. और फिर याद करते हैं, कि कितने साल बीत गए हैं, स्कूल ख़त्म करके. “आह, वक्त तो कैसे उड़ जाता है! क्या पुरानी बात है, और देखो तो, तीस साल बीत गए. फिर, क्योंकि आपको मालूम है, कि उनके पास कितने पैसे हैं, और इस बारे में आपको बेवकूफ़ नहीं बनाया जा सकता, तो आपको चाय पेश की जाती है, कल के टोस्ट के साथ और बातें होने लगती हैं ‘बीफ' की कीमत के बारे में और बूढ़े वाचमैन के बारे में, और इस बारे में, कि पुराने क्वार्टर में हवा फर्श को छूती हुई बहती थी, और नए वाले में छत को छूकर बहती है, मगर उसका किराया दस रूबल ज़्यादा है.

‘पराये' आपके बारे में बहुत उज्जवल भविष्यवाणी करते हैं. आप शायद सभी काम और व्यवसाय बेहतरीन तरीके से कर लेते हैं. क्या बात है! आपकी बुद्धि, और लगन से, और आपकी मिलनसारिता से!

‘अपने' इसके विपरीत, पहले ही आपके लिए अफ़सोस प्रकट करने लगते हैं, अविश्वास से सिर हिलाने लगते हैं, और कांव-कांव करने लगते हैं.आप के बारे में उनकी पूर्वधारणाएं अच्छी नहीं हैं. और, इसके अलावा, आपकी लापरवाही, अस्तव्यस्तता, भुलक्कड स्वभाव और मिलनसारिता के अभाव के बारे में जानते हुए, वे यह सिद्ध कर सकते हैं, कि अगर आप समय रहते नहीं संभले, और अपने दिमाग से बेवकूफी भरे शौक नहीं निकाल फेंके, तो आपको कई अप्रियताओं और दुखद परिणामों का सामना करना पडेगा. ये एहसास कि ‘पराये' ‘अपनों' से कितने ज़्यादा प्यारे हैं, धीरे धीरे लोगों में घर करता जा रहा है, और मुझे दो बार इस पर यकीन करने का मौक़ा मिल चुका है.

एक बार – ये हुआ था, रेल के कम्पार्टमेंट में – कोई एक खडूस महाशय अपने पड़ोसी पर चिल्ला रहे थे: “ये आप इतना पसर कर क्यों बैठे हैं? समझना चाहिए कि दूसरों को भी जगह चाहिए. अगर आप असभ्य आदमी हैं, तो आपको कुत्तों के डिब्बे में जाना चाहिए, न कि मुसाफिरों के. ये बात याद रखना!” और पड़ोसी ने उसे जवाब दिया, “अचरज की बात है! ज़िंदगी में पहली बार मुझे देख रहे हैं, और ऐसे चिल्ला रहे हैं, जैसे मैं आपका सगा भाई हूँ! शैतान जाने, ये सब क्या है!”

दूसरी बार मैंने सुना जब एक जवान महिला अपने पति की तारीफ़ कर रही थी और कह रही थी: “हमारी शादी को चार साल हो गए हैं, मगर वह हमेशा प्यार से, नम्रता से, बहुत ध्यान से पेश आते है, जैसे कोई अजनबी हो! और सुनने वाले भी इस अजीब प्रशंसा पर चौंके नहीं. मुझे भी अचरज नहीं होता.

 

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