ज़िन्दगी और कॉलर
नादेझ्दा तेफ़ी
अनुवाद
आ. चारुमति
रामदास
आदमी सिर्फ़ कल्पना करता है, कि उसका वस्तुओं के ऊपर असीमित अधिकार है.
कभी कभी बेहद मामूली चीज़ आपके जीवन में प्रवेश कर जाती है, उसे मोड़ देती है और पूरे भाग्य को घुमा
देती है - उस दिशा में नहीं, जहां उसे जाना चाहिए था. ओलेच्का रोज़वा तीन साल तक एक ईमानदार आदमी की
पत्नी थी. स्वभाव से शांत, शर्मीली, दिखावा नहीं करती थी, पति के प्रति पूरी तरह समर्पित थी, अपनी मामूली ज़िंदगी से संतुष्ट थी. मगर
एक बार वह गस्तिनी द्वोर (शॉपिंग मॉल) में गई और, मैन्युफेक्चरिंग
यूनिट की खिडकी में झांकते हुए,उसने एक कलफ़ लगी
हुई लेडीज़ नेकटाई देखी, जिसमें एक पीली
रिबन पिरोई गई थी. एक ईमानदार महिला की तरह, पहले उसने सोचा:
‘क्या बात सोची है!’ इसके बाद जाकर खरीद ली. घर में आईने के सामने देखा. ऐसा लगा, कि अगर पीले रिबन को सामने से नहीं, बल्कि किनारे
से बांधा जाए, तो कुछ ऐसी चीज़ बनेगी,
जिसे समझाया नहीं जा सकता, कि फिर भी,
अच्छा है, बुरा नहीं है. मगर कॉलर को एक
नए ब्लाउज़ की ज़रूरत थी. पुराने ब्लाउज़ों में से एक भी उस पर नहीं जंचता था. ओलेच्का
पूरी रात परेशान रही, और सुबह ‘गस्तिनी द्वोर’ जाकर, घर के खर्चे के लिए रखे पैसों
से ब्लाऊज खरीद लिया. सब कुछ एक साथ पहनकर देखा. अच्छा था, मगर स्कर्ट ने पूरा ‘शो’ बिगाड़ दिया था. कॉलर
स्पष्ट रूप से गहरी प्लेट्स वाले गोल स्कर्ट की मांग कर रहा था. अब और ज्यादा पैसे
नहीं थे। मगर आधे रास्ते पर तो नहीं ना रुकना था? ओलेच्का ने चांदी और कंगन को
गिरवी रख दिया. उसके दिल में बेचैनी और घबराहट थी, और जब
कॉलर ने नए जूतों की मांग की, तो वह बिस्तर पर लेट गई और
पूरी शाम रोती रही. दूसरे दिन वह बिना घड़ी के, मगर उन्हीं जूतों में घूम रही थी, जिनकी फरमाईश कॉलर ने की थी. शाम को, परेशान और
बदहवास, उसने हिचकियाँ लेते हुए अपनी दादी से कहा, “ मैं सिर्फ एक मिनट के लिए आई हूँ. पति बहुत बीमार है. डॉक्टर ने हर रोज़
कन्याक से उसका बदन पोंछने के लिए कहा है, और ये इतना महँगा
है, दादी. दादी भली थी, और अगली ही
सुबह ओलेच्का ने अपने लिए हैट, बेल्ट और दस्ताने ख़रीद लिए, जो कॉलर से ‘मैच’ करते थे. आगे के कुछ दिन और भी
ज़्यादा मुश्किल थे. वह अपने सभी रिश्तेदारों और परिचितों के पास भागी, झूठ बोलकर उनसे पैसे लिए, और फिर एक धारियोंवाला,
फूहड़ दीवान खरीद लिया, जिससे उसे और उसके ईमानदार पति को उबकाई आ रही थी, और उसकी
चोर रसोईन को भी, मगर जिसकी कॉलर कई दिनों से जिद्दीपन से मांग कर रहा था. वह एक
अजीब ज़िन्दगी जीने लगी. अपनी नहीं, बल्कि कॉलर की ज़िंदगी. मगर
कॉलर तो कुछ अस्पष्ट, भ्रमित शैली का था, और ओलेच्का, उसे खुश करते हुए पूरी तरह पगला गई थी.
– ‘अगर तुम अंग्रेज़
हो, और ये चाहते हो, कि मैं सोया खाऊँ, तो तुमने पीली टाई क्यों पहनी है? ये व्यभिचार क्यों, जो मैं समझ नहीं पाती, और जो मुझे झुके हुए तल से नीचे की ओर धकेल रहा है? किसी कमज़ोर और चरित्रहीन व्यक्ति की तरह, उसने जल्दी ही हाथ खड़े कर दिए
और बहाव के साथ तैरने लगी, जिसका नियंत्रण नीच कॉलर कब से कर
रहा था. उसने बाल कटवा लिए, सिगरेट पीने लगी, अगर कहीं दुहरे अर्थ वाला वाक्य सुन लेती, तो ज़ोर
से ठहाके लगाने लगी. उसके दिल की गहराई में अपनी परिस्थिति की तमाम भयावहता पनप
रही थी, और कभी कभी, रातों को या दिन में भी, जब कॉलर धोया जा रहा होता, वह सिसकियाँ लेती और
प्रार्थना करती, मगर कोई रास्ता न देख पाती. एक बार तो उसने
अपने पति को सारा भेद बताने का फैसला कर लिया, मगर उस भले
ईमानदार आदमी ने सोचा कि वह सिर्फ भद्दा मज़ाक कर रही है, और, उसकी खुशामद करने के लिए, बड़ी देर तक ठहाके लगाता रहा. तो, परिस्थिति बद से बदतर होती गई. आप पूछेंगे, उसने उस
कलफ़ लगी हुई भद्दी चीज़ को खिड़की से बाहर क्यों नहीं फेंक दिया? वह ऐसा न कर सकी.
इसमें कोई अजीब बात नहीं है. सभी मानसिक चिकित्सक जानते हैं,
कि नर्वस और मानसिक रूप से कमजोर लोगों के लिए कुछ पीडाएं,
अपनी सारी तकलीफों के बावजूद, आवश्यक हो जाती हैं. और वे इस मीठी पीड़ा को स्वस्थ शान्ति
से नहीं बदलना चाहते – किसी भी कीमत पर. तो, इस संघर्ष में
ओलेच्का अधिकाधिक कमजोर होती गई, और कॉलर मज़बूत होता गया और
उस पर राज करता रहा.
एक बार उसे एक पार्टी में
निमंत्रित किया गया. पहले वह कहीं नहीं जाती थी, मगर अब कॉलर
उसकी गर्दन में लिपट गया था और वह चली गई. वहां उसने बेहद बदतमीज़ी से बर्ताव किया
और उसके सिर को दाएं-बाएं घुमाता रहा. डिनर के बीच एक स्टूडेंट ने, जो ओलेच्का की बगल में बैठा था, मेज़ के नीचे उसका
पैर हिलाया. ओलेच्का गुस्से से बेकाबू हो गई, मगर कॉलर ने उसके बदले जवाब दिया: “
बस इतना ही? ओलेच्का शर्म और खौफ़ से सुन रही थी और सोच रही
थी: ‘खुदा! मैं कहाँ फंस गई?!’ डिनर के बाद स्टूडेन्ट ने उसे
घर तक छोड़ने की पेशकश की. इससे पहले कि ओलेच्का समझ पाती कि बात क्या है, कॉलर ने धन्यवाद दिया और खुशी से तैयार हो गया. गाड़ी में बैठे ही थे, कि स्टूडेंट अश्लीलता से फुसफुसाया: ‘मेरी प्यारी!’ और जवाब में कॉलर
कमीनेपन से खिखियाने लगा. तब स्टूडेंट ने ओलेच्का को अपनी बाहों में लिया और सीधे
उसके होठों का चुम्बन ले लिया. उसकी मूंछें गीली थीं, और
पूरे चुम्बन में अचार की गंध थी, जिसे डिनर में परोसा गया
था. शर्म और अपमान के कारण ओलेच्का रोने रोने को हो गयी, मगर
कॉलर ने बड़ी सफ़ाई से उसका सिर घुमाया और फिर से खिलखिलाया: “बस इतना ही?” फिर स्टूडेन्ट और कॉलर के साथ रेस्टारेंट गए, रूमीन को सुनने के लिए.
ऑफिस के कमरे में गए। - ‘यहां कोई म्यूज़िक नहीं है!’- ओलेच्का नाराज़ हो गयी. मगर
स्टूडेंट और कॉलर ने उसकी तरफ़ कोई ध्यान नहीं दिया. उन्होंने शराब पी, बेहूदगी भरी
बातें कीं और चुंबन लिया. ओलेच्का सुबह घर लौटी. खुद ईमानदार पति ने दरवाज़ा खोला.
उसका चेहरा पीला था और उसने हाथों में गिरवी वाली दुकान की रसीदें थीं. – “तुम
कहां थीं? मैं पूरी रात नहीं सोया! तुम कहां थीं?” उसकी पूरी रूह कांप रही थी, मगर कॉलर अपनी ही लकीर
पीट रहा था।– “कहाँ थी? स्टूडेंट के साथ बतिया रही थी!”
ईमानदार पति लड़खड़ा गया।
“ओल्या! ओलेच्का! तुम्हें क्या हो गया है! बताओ, तुमने चीज़ें
क्यों गिरवी रखीं? सातव और यानिन से क्यों पैसे लिए? पैसे
कहाँ उडाए?”
“पैसे? उड़ा दिए!”
और जेबों में हाथ रखकर वह
ज़ोर ज़ोर से सीटी बजाने लगी, जो वह पहले कभी बजा ह्री नहीं सकती थी. और क्या वह
‘उड़ा दिए’ – इस बेवकूफी भरे शब्द का मतलब जानती थी? क्या वह उसीने कहा था?
ईमानदार पति ने उसे छोड़ दिया
और दूसरे शहर में तबादला करावा अलिया.
मगर इससे भी दुःख भरी बात यह
हुई, कि उसके जाने के बाद अगले ही दिन कॉलर कपड़े धोते समय खो गया.
नम्र स्वभाव की ओलेच्का एक
बैंक में काम करती है. वह इतनी नम्र है, कि ‘ओम्नीबस’ शब्द से ही लाल हो जाती है, क्योंकि वह “अब्नीमुस’ (आलिंगन करना – अनु,) जैसा लगता है. और
कॉलर?” आप पूछिए.
“मैं कैसे जान सकता हूँ?” मैं जवाब दूंगा. “उसे तो धोबन को दिया गया था,
उसीसे पूछिए. ऐह, ज़िंदगी!”
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